Jammu-Kashmir: पलायन के 36 सालों के उपरांत कश्मीरी विस्थापितों को वापस कश्मीर लाने की कोशिशों पर हजारों करोड़ का खर्चा किया जा चुका है पर कामयाबी फिलहाल कोसों दूर है। सरकारी दस्तावेज खुद कहते हैं कि पुनर्वास पैकेज के तहत जो 1618 करोड़ खर्च किए गए वे सिर्फ 3 कश्मीरी परिवारों को कश्मीर लौटाने में कामयाब हुए हैं। दरअसल जम्मू कश्मीर प्रशासन ने सूचना का अधिकार के एक सवाल के जवाब में कश्मीरी प्रवासियों के लिए एक पुनर्वास पैकेज का ब्योरा दिया है, जिसमें आवास, रोजगार और वित्तीय सहायता के घटक शामिल हैं।
राहत और पुनर्वास आयुक्त (प्रवासी) के कार्यालय द्वारा जारी जवाब के अनुसार, सरकार ने 2009 में कश्मीरी प्रवासियों की घाटी में वापसी और पुनर्वास के लिए एक पैकेज मंजूर किया था, जिसका वित्तीय परिव्यय ₹1,618.40 करोड़ था।आरटीआई के जवाब में कहा गया है कि इस योजना में कई घटक शामिल हैं, जैसे आवास सहायता, ट्रांजिट आवास, नकद राहत जारी रखना, छात्रों के लिए छात्रवृत्तियां, रोजगार के अवसर, किसानों और बागवानों को सहायता, और ऋणों पर ब्याज माफी।
आवास घटक के तहत, पूरी तरह या आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त घरों के लिए ₹7.5 लाख की वित्तीय सहायता प्रदान की गई है, जबकि जर्जर या अप्रयुक्त घरों के लिए ₹2 लाख प्रदान किए जाते हैं। इसके अलावा, उन लोगों के लिए ग्रुप हाउसिंग सोसाइटियों में घर खरीदने या बनाने के लिए ₹7.5 लाख का प्रावधान है, जिन्होंने संबंधित कानून लागू होने से पहले अपनी संपत्तियां बेच दी थीं।
जवाब में बताया गया है कि अब तक इस पैकेज के तहत घाटी में लौटने का विकल्प चुनने वाले परिवारों की संख्या बहुत कम है। रोजगार के मामले में, सरकार ने 6,000 बेरोजगार विस्थापित युवाओं को नौकरियां देने का लक्ष्य रखा था, जिनमें से 5,880 नियुक्तियां की जा चुकी हैं, जबकि शेष पद भर्ती के विभिन्न चरणों में हैं।
ट्रांजिट आवास के संबंध में, जवाब में कहा गया है कि घाटी में कश्मीरी प्रवासी कर्मचारियों के लिए 6,000 आवास इकाइयां बनाई जा रही हैं। 1 अप्रैल, 2026 तक, 4,118 इकाइयां पूरी हो चुकी हैं और 1,882 निर्माणाधीन हैं।
दस्तावेज के अनुसार, सरकार ने प्रवासी संपत्तियों की सुरक्षा और संकट में बिक्री को रोकने के लिए कानूनी प्रावधान भी लागू किए हैं, जिसके तहत ज़िला मजिस्ट्रेटों को ऐसी संपत्तियों का संरक्षक नियुक्त किया गया है।
आरटीआई का जवाब आगे स्पष्ट करता है कि दी गई जानकारी उपलब्ध रिकार्ड पर आधारित है और दस्तावेजों में दर्ज आंकड़ों से परे की व्याख्याओं तक इसका विस्तार नहीं है।