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वेदप्रताप वैदिक का ब्लॉगः भारत और पाकिस्तान के मुस्लिम सम्मेलन

By वेद प्रताप वैदिक | Updated: December 22, 2021 12:58 IST

पाकिस्तानी सम्मेलन का केंद्रीय विषय सिर्फ अफगानिस्तान था जबकि भारतीय सम्मेलन में अफगानिस्तान पर पूरा ध्यान दिया गया लेकिन उक्त पांचों गणतंत्रों—कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, ताजिकिस्तान और किर्गिजिस्तान के साथ भारत के व्यापारिक, आर्थिक, सामरिक और सांस्कृतिक सहकार के मुद्दों पर भी संवाद हुआ।

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पिछले सप्ताह एक ही समय में दो सम्मेलन हुए। एक भारत में और दूसरा पाकिस्तान में! दोनों सम्मेलन मुस्लिम देशों के थे। पाकिस्तान में जो सम्मेलन हुआ, उसमें दुनिया के 57 देशों के विदेश मंत्रियों और प्रतिनिधियों के अलावा अफगानिस्तान, रूस, अमेरिका, चीन और यूरोपीय संघ के प्रतिनिधियों को भाग लेना था लेकिन अनेक देशों ने इसमें हिस्सा नहीं लिया। जबकि भारत में होनेवाले सम्मेलन में मध्य एशिया के पांचों मुस्लिम गणतंत्रों के विदेश मंत्रियों ने भाग लिया। इन विदेश मंत्रियों ने इस्लामाबाद जाने की बजाय नई दिल्ली आना ज्यादा पसंद किया। इस्लामाबाद के सम्मेलन में इस्लामी देशों के एक-तिहाई विदेश मंत्री ही पहुंचे।

पाकिस्तानी सम्मेलन का केंद्रीय विषय सिर्फ अफगानिस्तान था जबकि भारतीय सम्मेलन में अफगानिस्तान पर पूरा ध्यान दिया गया लेकिन उक्त पांचों गणतंत्रों—कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, ताजिकिस्तान और किर्गिजिस्तान के साथ भारत के व्यापारिक, आर्थिक, सामरिक और सांस्कृतिक सहकार के मुद्दों पर भी संवाद हुआ। इस तरह का यह तीसरा संवाद है। इन पांचों विदेश मंत्रियों के पाकिस्तान न जाने को भारत की जीत मानना तर्कसंगत नहीं है, क्योंकि इस सम्मेलन की तारीखें पहले से तय हो चुकी थीं। इस समय तो खेद की बात यह है कि इस्लामाबाद के सम्मेलन में भारत को नहीं बुलाया गया जबकि चीन, अमेरिका और रूस आदि को भी बुलाया गया था। याद रहे कि भारत ने जब अफगानिस्तान पर पड़ोसी देशों के सुरक्षा सलाहकारों का सम्मेलन बुलाया था तो उसमें पाकिस्तान और चीन, दोनों निमंत्रित थे लेकिन दोनों ने उसका बहिष्कार किया।

अफगान-संकट के इस मौके पर मैं पाकिस्तान से थोड़ी दरियादिली की उम्मीद करता हूं। पाकिस्तान भी भारत की तरह कह रहा है कि अफगानिस्तान में सर्वसमावेशी सरकार बननी चाहिए, उसे आतंकवाद का अड्डा नहीं बनने देना है और दो-ढाई करोड़ नंगे-भूखे लोगों की प्राण-रक्षा करना है। भारत ने 50 हजार टन अनाज और डेढ़ टन दवाइयां काबुल भिजवा दी हैं। उसने यह खिदमत करते वक्त हिंदू-मुसलमान के भेद को आड़े नहीं आने दिया। पाकिस्तान चाहे तो इस अफगान-संकट के मौके पर भारत-पाक संबंधों को सहज बनाने का रास्ता निकाल सकता है। इस अफगान-सम्मेलन में भी इमरान खान कश्मीर का राग अलापने से नहीं चूके लेकिन क्या वे यह नहीं समझते कि कश्मीर को भारत-पाक खाई बनाने की बजाय भारत-पाक सेतु बनाना दोनों देशों के लिए ज्यादा फायदेमंद है? यदि भारत-पाक संबंध सहज हो जाएं तो अफगान-संकट के तत्काल हल में तो मदद मिलेगी ही, मध्य एशिया और दक्षिण एशिया के राष्ट्रों के बीच अपूर्व सहयोग का ऐतिहासिक दौर शुरू हो जाएगा।

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