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ब्लॉग: विपक्ष को बदलने होंगे अपने तौर-तरीके

By राजेश बादल | Updated: December 6, 2023 11:21 IST

कांग्रेसी को अपनी करारी हार पर आत्ममंथन करने की जरुरत है, क्योंकि इस चुनावों में उसने किसी 'इंडिया' गठबंधन का सहयोग नहीं लिया। इसके बावजूद वे कहते रहे हैं कि साथ लड़ने के लिए तैयार हैं। लेकिन, स्थानीय नेताओं ने किसी की एक न सुनी, जिसकी वजह से कांग्रेस को तीन प्रदेशों में हार मिली।

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ठळक मुद्दे5 विधानसभाओं के परिणाम सामने हैं4 सालों में किसी पार्टी ने कोई उल्लेखनीय प्रदर्शन नहीं किया लेकिन, कांग्रेस अपनी वही पुरानी रीति-नीति अपनाए हुए हैं

5 विधानसभाओं के परिणाम सामने हैं। प्रतिपक्ष की निर्बल काया जीतोड़ मेहनत के बाद एक बार फिर चुनावी मंच पर उपस्थित है। पिछले आम चुनाव में कांग्रेस ही नहीं, समूचे विपक्षी दल अपने कुपोषित चेहरे को लेकर सामने आए थे। जाहिर है कि चार सालों में किसी पार्टी ने कोई उल्लेखनीय प्रदर्शन नहीं किया है।

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी, हिमाचल और कर्नाटक में कांग्रेस तथा पंजाब में आम आदमी पार्टी ने ताकत बढ़ाई है। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने जब आकाश-पाताल एक किया, तब कहीं वे तृणमूल कांग्रेस का किला बचा पाईं, लेकिन पंजाब में कांग्रेस यह करिश्मा नहीं कर सकी। उसने अपनी गलतियों से आम आदमी पार्टी को उपहार में सत्ता दे दी।

अलबत्ता, वह भाजपा से हिमाचल और कर्नाटक तथा तेलंगाना में भारत राष्ट्र समिति से सरकारें छीनने में कामयाब रही। लेकिन वह राजस्थान और छत्तीसगढ़ में अपने मजबूत किले गंवा बैठी। इन सबका क्या संदेश और संकेत है? स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपरा तो यही कहती है कि निर्वाचित सरकारों को पोखरों की शक्ल में नहीं, बल्कि बहती हुई नदी के निर्मल पानी की बहती हुई धारा के समान होना चाहिए। इस नजरिए से राजस्थान ने 25 बरस से हर चुनाव में पार्टी को बदल देने की परंपरा बना ली है।

जब किसी राज्य या केंद्र सरकार को केवल 5 साल के लिए हुकूमत मिलती है तो उसमें काम करने की जिजीविषा बनी रहती है, भ्रष्टाचार कम होता है और चुनाव जीतने के लिए अनैतिक रास्ते नहीं अपनाए जाते। दूसरी ओर विपक्ष को भरोसा रहता है कि उसे अगली बार सत्ता संभालनी है इसलिए वह अपने कार्यक्रमों और नीतियों की धार निरंतर तेज रखता है। यही एक संवैधानिक लोकतंत्र की परंपरा है।

इस परंपरा में विपक्ष और पक्ष के बीच कोई बहुत अधिक फासला नहीं रहता। दोनों एक गाड़ी के पहिए हैं। अगर यदि पक्ष के पहिए का आकार ट्रैक्टर के आकार के बराबर हो और प्रतिपक्ष के पहिए का आकार किसी स्कूटर के पहिए के बराबर हो, तो फिर जम्हूरियत की गाड़ी का ईश्वर ही मालिक है। पक्ष तो कभी नहीं चाहेगा कि विपक्ष के पहिए का आकार बड़ा होता रहे और सशक्त प्रतिपक्ष उसके लिए मुसीबत खड़ी करता रहे, इसीलिए वह प्रतिपक्ष को दुर्बल बनाए रखने की कोशिशें करता रहता है।

तो पक्ष की इन कोशिशों के मुकाबले के लिए आज का विपक्ष कितना तैयार है? वह चुनाव-दर-चुनाव अपना बिखरता हुआ जनाधार कैसे एकत्रित करेगा और क्या उसके लिए हालिया चुनाव कोई गंभीर संदेश, संकेत या चेतावनी देते हैं? यकीनन सबसे बड़ा विपक्षी दल होने के नाते कांग्रेस को गहरा आघात लगा है।

नतीजे कहते हैं कि छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में आमने-सामने का मुकाबला था और भाजपा, कांग्रेस करीब-करीब 40 फीसदी वोटों के ढेर पर बैठी थीं। इन प्रदेशों में सिर्फ दो-चार प्रतिशत मतों के अंतर पर हार-जीत होती है। ऐसे में कांग्रेस ने इतना छोटा फासला घटाने के प्रयास क्यों नहीं किए? कांग्रेस जानती थी कि थोड़े समय पहले ही इंडिया नाम से गठबंधन का एक ताकतवर चेहरा बना है। इस गठबंधन में शामिल सभी पार्टियों की निगाहें उस पर लगी हैं।

लेकिन, शायद कांग्रेस का स्थानीय नेतृत्व ही अपने आप में गंभीर नहीं था। उसने पंजाब, गुजरात और उत्तर प्रदेश जैसे प्रदेशों में हार से सबक नहीं सीखा क्योंकि कमोबेश उन राज्यों में हार के जो कारण हैं, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भी वही वजहें हैं। उम्मीदवारों के चुनाव में गलतियां और तीनों क्षत्रपों कमलनाथ, अशोक गहलोत और भूपेश बघेल पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता इसका बड़ा कारण है।

इसके अलावा भले ही दो-चार फीसदी मत बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी, आम आदमी पार्टी और गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के रहे हों, कांग्रेस को उनकी उपेक्षा करने का अधिकार नहीं था। खासतौर पर उस स्थिति में जबकि वे दल कांग्रेस के साथ मिलकर काम करना चाहते थे। पर, कांग्रेस के स्थानीय क्षत्रपों ने उनकी अपमान करने की हद तक उपेक्षा की। बदले में उन्होंने कांग्रेस को हार सौंप दी।

दरअसल, कांग्रेस में पर्याप्त शोध और मुद्दों के बारे में जमीनी अध्ययन की कमी भी पार्टी की देह में बीमारी की तरह फैल गई है। संगठन की गांव-गांव में काम कर रही इकाइयां अब नजर नहीं आतीं। कांग्रेस सेवा दल, युवा कांग्रेस, महिला कांग्रेस और भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन जैसे पार्टी के आनुषंगिक संगठन आज भाजपा के आवरण में छिपे दिखाई देते हैं।

अध्ययन के लिए यह एक दिलचस्प आंकड़ा हो सकता है कि जब 1980 में भाजपा का गठन हुआ, तब उसका मतदाता प्रतिशत 10 से 15 प्रतिशत के बीच था और कांग्रेस का मत प्रतिशत लगभग 40 से 35स फीसदी था। इसके बाद साल-दर-साल चुनाव होते रहे और भाजपा धीरे-धीरे अपना जनाधार बढ़ाती रही। आज उसका मत प्रतिशत 40 फीसदी से ऊपर है। दूसरी तरफ कांग्रेस तैंतालीस साल पहले के जनाधार पर ठहरी हुई है।

आज भी उसका मत प्रतिशत 40-42 पर ही ठहरा हुआ है। यह सवाल पूछा जा सकता है कि जब भाजपा अपना नया जनाधार 1980 से करीब 30 प्रतिशत बढ़ा सकती है तो कांग्रेस में ऐसा क्या हुआ, जो वह आधी सदी के बाद भी मतों के उसी चार दशक पुराने ढेर पर बैठी हुई है। आत्ममंथन के लिए कांग्रेस को यहां से एक बिंदु मिलता है।

यदि, लोकसभा चुनाव में प्रतिपक्ष को अपने पहिए का आकार बड़ा करना है और इंडिया की अगुआई करना है तो उसे अपने मतों का ढेर ऊंचा करना होगा। उसे सहयोगी दलों को दादागीरी के साथ नहीं, समान व्यवहार से जोड़ कर रखना होगा।

मध्यप्रदेश के चुनाव में इंडिया के सहयोगी दल कमलनाथ से चुनाव पूर्व समझौते के लिए अनुरोध करते रहे, लेकिन कमलनाथ ने उन्हें कोई अहमियत नहीं दी। गोंडवाना गणतंत्र पार्टी सहयोग चाहती थी। कांग्रेस ने उन्हें महत्व नहीं दिया। विंध्य जनता पार्टी तभी बनी, जब उसके मुखिया को कांग्रेस ने टिकट देने से इनकार कर दिया। संसार की एक पुरानी पार्टी कांग्रेस के लिए यह कोई शुभ संकेत नहीं है।

टॅग्स :विधानसभा चुनाव 2023कांग्रेससमाजवादी पार्टीबहुजन समाज पार्टी (बसपा)
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