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ब्लॉग: ऑनलाइन गेम के चंगुल से बच्चों को बचाने की जरूरत

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: September 25, 2024 10:22 IST

किशोर उम्र के बच्चों के लिए यह सीमा अधिकतम तीन घंटे है. इससे हम अंदाजा लगा सकते हैं कि अगर हमारे देश में बच्चे दिन में सात-आठ घंटे तक ऑनलाइन गेम खेल रहे हैं तो यह कितना खतरनाक है.

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ठळक मुद्देसर्वे में पता चला कि बिहार के 79 फीसदी बच्चे 24 घंटे में से करीब आठ घंटे का समय फोन पर गेम खेलने में बिताते हैं. दूसरे स्थान पर उत्तर प्रदेश और तीसरे स्थान पर महाराष्ट्र है, जहां करीब 75 फीसदी बच्चे ऑनलाइन गेम खेलते हैं. गेमिंग की लत के कारण बच्चे गलत संगत में पड़ रहे हैं. 

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के एक सर्वेक्षण में बच्चों के ऑनलाइन गेम खेलने को लेकर जो जानकारी सामने आई है, वह बेहद चिंताजनक है. सर्वे में पता चला कि बिहार के 79 फीसदी बच्चे 24 घंटे में से करीब आठ घंटे का समय फोन पर गेम खेलने में बिताते हैं. दूसरे स्थान पर उत्तर प्रदेश और तीसरे स्थान पर महाराष्ट्र है, जहां करीब 75 फीसदी बच्चे ऑनलाइन गेम खेलते हैं. गेमिंग की लत के कारण बच्चे गलत संगत में पड़ रहे हैं. 

सर्वे के अनुसार 60 फीसदी से अधिक बच्चे अभिभावकों के हजारों रुपए ऑनलाइन गेमिंग के चक्कर में बर्बाद कर चुके हैं, वहीं कई बच्चे ऐसे हैं जो अपने साथी से कर्ज लेकर गेम खेल रहे हैं. ऑनलाइन गेम खेलने वालों में 7 साल से लेकर 17 साल तक के बच्चों की संख्या सर्वाधिक है. गेम में असफलता के कारण 50 फीसदी बच्चे तनाव में रहते हैं और लगातार बैठने से उन्हें कमर, सिर और कंधे में दर्द की समस्या होती है. 

यह चिंताजनक ट्रेंड सिर्फ अपने देश में ही नहीं है. एक अध्ययन में पता चला है कि अमेरिका समेत कुछ बड़े देशों में 11 से 17 वर्ष के लगभग 97 प्रतिशत बच्चे स्कूल के समय में औसतन 43 मिनट तक फोन का उपयोग करते हैं. चूंकि कक्षाओं के बीच या दोपहर के भोजन और छुट्टियों के समय वे फोन देख रहे होते हैं, इसलिए मैदान में जाकर खेलने, दोस्तों से बात करने या उनके साथ घूमने जाने के लिए उनके पास समय ही नहीं बचता है. 

मैदानी खेल जहां बच्चों को स्वस्थ रखने में सहायक होते हैं, वहीं ऑनलाइन गेम उनमें हिंसक प्रवृत्ति को बढ़ावा दे रहे हैं. टास्क पूरा करने की चुनौती देने वाले ब्लू व्हेल जैसे गेम तो इतने खतरनाक हैं कि इसके चक्कर में अब तक अनेक बच्चों की जान जा चुकी है. इसीलिए अनेक देशों ने बच्चों के स्क्रीन टाइम पर पाबंदी लगाना शुरू कर दिया है. 

स्वीडन ने तो 2 साल तक के बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम पूरी तरह बैन कर दिया, जबकि फ्रांस ने एक कदम और आगे बढ़ते हुए तीन साल से कम उम्र के बच्चों के लिए स्क्रीन पूरी तरह बैन करने की बात कही है. 

पढ़ने-सुनने में हो सकता है यह बात अजीब लगे कि दो-तीन साल के बच्चे क्या मोबाइल देखेंगे लेकिन अपने आसपास ही हम अगर गौर करें तो पाएंगे कि जिन बच्चों को हम बहलाने के लिए मोबाइल दे देते हैं, उन्हें इतनी जल्दी लत लग जाती है कि मोबाइल छुड़ाने पर वे रोने लगते हैं. दरअसल उम्र जितनी कम हो, किसी भी चीज की आदत उतनी ही जल्दी लगती है. 

इसीलिए अमेरिका, आयरलैंड, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया जैसे देश बच्चों के लिए एडवाइजरी जारी कर चुके हैं. इसके अनुसार 2 से 5 साल तक के बच्चे दिन में अधिकतम एक घंटा स्क्रीन देख सकते हैं, जबकि 6 से 12 साल तक के बच्चे दिन में अधिकतम दो घंटे तक. 

किशोर उम्र के बच्चों के लिए यह सीमा अधिकतम तीन घंटे है. इससे हम अंदाजा लगा सकते हैं कि अगर हमारे देश में बच्चे दिन में सात-आठ घंटे तक ऑनलाइन गेम खेल रहे हैं तो यह कितना खतरनाक है. लंबे समय तक स्क्रीन देखने से आंखों पर डिजिटल तनाव, ड्राई आई डिजीज यानी सूखी आंखें, मायोपिया यानी निकट दृष्टि दोष की समस्या हो सकती है. 

इसीलिए  चीन, कोरिया जैसे देशों में तो 50 प्रतिशत तक बच्चों में मायोपिया हो रहा है. जाहिर है कि स्क्रीन टाइम का ज्यादा होना ही अपने आप में एक बड़ा संकट है और ऑनलाइन गेम तो जले पर नमक जैसा है, जिसे बच्चों का भविष्य बचाने के लिए तत्काल विनियमित किए जाने की जरूरत है.

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