एक जमाना था, जब हर घर में एक बेरोजगार बंदा सिर्फ कतार में लगने के लिए होता था. वो रेलवे स्टेशन पर आरक्षण के लिए लगने वाली कतार से राशन की कतार और सिनेमाघर पर टिकट लेने के लिए लगी लंबी कतार से बैंक में अपना ही पैसा निकालने के लिए लगी कतार में आवश्यकतानुसार लगा रहता था.
जिस तरह 90 साल का बुजुर्ग दोबारा दांत उगने का अनुभव नहीं पा सकता, आम हिंदुस्तानी गंगा के पूर्ण रूप से स्वच्छ होने का सुख नहीं पा सकता, उसी तरह नई पीढ़ी कितनी भी कोशिश कर ले, पुराने वक्त के कई अनुभव नहीं ले सकती.
नई पीढ़ी कह सकती है कि कतार में लगने का अनुभव भी कोई लेने की चीज थी! दरअसल, उन्हें पता ही नहीं कि कतार में लगने के कितने फायदे होते थे. मसलन- बंदे के पैर मजबूत होते थे. बिना साइक्लिंग टांगों की एक्सरसाइज होती थी. जब कभी धूप में कतार में लगना पड़ता तो विटामिन डी की प्राप्ति होती थी.
कतार में सामाजिक मेलजोल का अनुपम दृश्य दिखाई देता था. कोई बंदा सामने वाले से कलम मांगता तो कोई पीछे वाले से माचिस, बीड़ी वगैरह. कतार में पीछे कोई हसीन कन्या हो तो आगे खड़ा युवक उसे आगे कर महिलाओं के लिए सम्मान का भाव प्रगट करता.
लाइन लंबी हो तो कभी प्याऊ से पानी लाने और कभी-कभी तो लड़की को आराम से बैठने को कहकर उसकी टिकट वगैरह लाते भी युवा देखे जाते थे. कालांतर में कतार से शुरू हुई ये मित्रता रेस्तरां वगैरह से होते हुए शादी के मंडप तक पहुंचती भी देखी गई.
सिनेमाघर में किसी फिल्म का शो हाउसफुल हो, कतार पर लाठीचार्ज हो रहा हो और लड़का अपनी सहेली के साथ पहुंची लड़की के लिए बीच कतार से टिकट लेकर निकले तो उसे लगभग ‘हीरो’ के समकक्ष रखा जाता था.
जमाना बदला तो कतार सिस्टम खत्म हो गया. सब ऑनलाइन होने लगा. घर का कतार वाला कामगार वास्तव में बेरोजगार हो गया और शायद इसलिए बेरोजगारों की संख्या बढ़ गई है. हमें सरकार का धन्यवाद कहना चाहिए कि उसने देशवासियों को लाइन में लगा दिया. पहले नोटबंदी के वक्त और अब वैक्सीन के लिए बूढ़े-जवान, अधिकारी-चपरासी सब कतार में लगे हैं.
हद ये कि जिसे वैक्सीन लग रही है, उनमें से कइयों को लग रहा है कि वो अब छुट्टे घूम सकते हैं. कोरोना अब उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता. कई जगह कोरोना वायरस उनके रक्षाकवच के आगे बेबसी से नहीं बल्कि उनके इस आत्मविश्वास को देखकर हंसते हंसते मर रहे हैं. समझ नहीं आ रहा कि भारत ‘हद से ज्यादा बुद्धिमानों’ का देश है या मासूमों का?