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आतंक और दहशत का पर्याय बन गया था जैश-ए-मुहम्मद?, आपरेशन सिंदूर ने मसूद अजहर की कमर तोड़ी

By सुरेश एस डुग्गर | Updated: May 15, 2025 15:16 IST

आत्मघाती हमलों में मानव बम का नया मोड़ कश्मीर के आतंकवाद के इतिहास में लाने वाला जैश-ए-मुहम्मद आज सर्वत्र चर्चा में है क्योंकि इसके सर्वेसर्वा मसूद अजहर की आपरेशन सिंदूर ने कमर तोड़ डाली है।

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ठळक मुद्देलोगों को दांतों तले अंगुली दबाने पर मजबूर कर दिया था।भारत सरकार को अपने 154 विमान यात्रियों को रिहा करवाना था। रिहाई के परिणामों के प्रति नहीं सोचा गया था।

जैश-ए-मुहम्मद अर्थात ’खुदा की सेना‘। जब नाम ही खुदा की सेना है तो काम भी वही होगा। जी हां, काम भी वही है। जैश-ए-मुहम्मद खुदा की इबादत के लिए जेहाद को रास्ता मानता है तो आत्मघाती हमलों को सेवा। इस्लाम में आत्महत्या की चाहे इजाजत नहीं दी जाती लेकिन जेहाद तथा धर्म की रक्षा के लिए कुर्बानी देने के तर्क को लेकर आत्मघाती हमलों में मानव बम का नया मोड़ कश्मीर के आतंकवाद के इतिहास में लाने वाला जैश-ए-मुहम्मद आज सर्वत्र चर्चा में है क्योंकि इसके सर्वेसर्वा मसूद अजहर की आपरेशन सिंदूर ने कमर तोड़ डाली है।

चर्चा में आखिर हो भी क्यों न। संसद भवन जैसी अति सुरक्षित समझे जाने वाली इमारत की सभी सुरक्षा व्यवस्थाओं को नेस्तनाबूद कर सारे देश को हिला देने वाले संगठन की चर्चा आज भी कश्मीर में ही नहीं बल्कि विश्वभर में होती रही है, जिसने अपने गठन के मात्र दो सालों के दौरान जितनी कार्रवाईयों को अंजाम दिया था उसने लोगों को दांतों तले अंगुली दबाने पर मजबूर कर दिया था।

अल-कायदा से प्रशिक्षण प्राप्त और ओसामा-बिन-लादेन की शिक्षाओं पर चलने वाले जैश-ए-मुहम्मद के संस्थापक आतंकी नेता मौलना मसूद अजहर के लिए वे क्षण बहुत ही अनमोल थे जब उसे जम्मू की जेल से इसलिए रिहा कर दिया गया था क्योंकि भारत सरकार को अपने 154 विमान यात्रियों को रिहा करवाना था। तब उसकी रिहाई के परिणामों के प्रति नहीं सोचा गया था।

अपनी रिहाई और संगठन के गठन के बाद तीन महीनों तक खामोश रहने वाले जैश-ए-मुहम्मद ने 19 अप्रैल 2000 को सारे विश्व को चौंका दिया था। कश्मीर की धरती को हिला दिया था। पहला मानव बम हमला किया था जैश-ए-मुहम्मद ने कश्मीर में। जैश-ए-मुहम्मद की ओर से बादामी बाग स्थित सेना की 15वीं कोर के मुख्यालय पर मानव बम का हमला करने वाला कोई कट्टर जेहादी नहीं था।

बल्कि 12 वीं कक्षा में पढ़ने वाला 17 वर्षीय मानसिक रूप से तथा कैंसर से पीड़ित युवक अफाक अहमद शाह था। इसके उपरांत मानव बम हमलों की झड़ी रूकी नहीं। क्रमवार होने वाले आत्मघाती हमलों में प्रत्येक आतंकी मानव बम की भूमिका निभाने लगा था। यह सब करने वाले थे जैश-ए-मुहम्मद के सदस्य। उन्होंने इस्लाम की उन हिदायतों को भी पीछे छोड़ दिया था।

जिसमें कहा गया था कि आत्महत्या करना पाप है। लेकिन वे इसे नहीं मानते और कहते हैंः’जेहाद तथा धर्म की रक्षा के लिए अपने शरीर की कुर्बानी दी जा सकती है।’ इस ’कुर्बानी’ का एक नया चेहरा फिर नजर आया था प्रथम अक्तूबर 2001 को। कश्मीर विधानसभा की इमारत पर मानव बम हमला करने वालों ने 47 मासूमों की जानें ले ली थी।

अभी विधानसभा पर हुए हमले के धमाके की गूंज से कानों को मुक्ति मिल भी नहीं पाई थी कि सारा विश्व स्तब्ध रह गया। दिन था 13 दिसंबर का और निशाना था भारतीय संसद भवन। कोई सोच भी नहीं सकता था। लेकिन जैश-ए-मुहम्मद ने यह ’हिम्मत’ दर्शाई थी और यह साबित कर दिया था कि सुरक्षा व्यवस्थाओं में कितने लूप होल थे।

सच में कश्मीर में करगिल युद्ध के बाद आरंभ हुए आत्मघाती हमलों, जिन्हें दूसरे शब्दों मे फिदाइन हमले भी कहा जाता रहा है, को नया रंग,रूप और मोड़ दिया था जैश-ए-मुहम्मद ने। उस जैश-ए-मुहम्मद ने जो आज भी आतंक और दहशत का पर्याय है सारे देश में। चौंकाने वाला तथ्य यह भी है कि अपने जन्म के अढ़ाई सालों के दौरान कश्मीर में जिन 65 के करीब आत्मघाती हमलों को अंजाम दिया गया था।

उनमें से 44 जैश-ए-मुहम्मद के खाते में जाते थे और इनमें से 32 में मानव बमों ने हिस्सा लिया था। नतीजतन आत्मघाती हमलों में हिस्सा लेने की ओर कश्मीरी युवकों के बढ़ते आकर्षण के कारण कश्मीर में युवकों के अभिभावक परेशान हो उठे थे। उनकी परेशानी यह थी कि उनके बच्व्चे आत्महत्या के रास्ते पर चलने की कोशिश कर रहे थे।

हालांकि पहले इसके लिए निरक्षर लोगों का इस्तेमाल हुआ करता था तो संसद भवन पर हुए हमले के बाद साफ हो गया था कि इस कार्य को अब पढ़े लिखों ने अपने हाथों में ले लिया था। यह भी सच है कि वर्ष 1988 में जम्मू कश्मीर में आतंकवाद के शुरू होने के बाद पहली बार कश्मीरी य्ाुवकों में फिदाय्ाीन (आत्मघाती जेहादी) बनने की ललक बढ़ी थी।

कश्मीर घाटी में जुलाई 1999 के बाद से संसद हमले तक की अवधि में कम से कम 65 फिदाय्ाीन हमले हो चुके थे, जिनमें 282 लोग मारे जा चुके थे। उल्लेखनीय्ा है कि इन मृतकों में हमलावर भी शामिल थे। इसके साथ ही घाटी में आतंकवाद का चेहरा भी उजागर हुआ था। अभी तक फिदाय्ाीन हमले करने वाले य्ाुवक 17 से 25 वर्ष के नौजवान हुआ करते थे।

जो कि बहुत कम पढे-लिखे युवा निरक्षर होते थे फिर ऐसे ऐसे हमलों में पढे-लिखे युवक भी शामिल होने लगे थ। पूर्व में फिदाय्ाीन हमलावर गरीब घरों के लडके हुआ करते थे लेकिन अब संपन्न घरों के लडकों पर भी फिदायीन बनने का भूत सवार हो गया था। पुलवामा हमला इसकी मिसाल है।

इसलिए वर्ष 2000 की 19 अप्रैल को श्रीनगर स्थित बादामी बाग में सेना की 15वीं कोर पर हमला करके खुद को बारूद से उडा देने वाले अफाक अहमद शाह के माता-पिता अभी तक नहीं समझ्ा पाए थे कि उनके 12वीं कक्षा में पढ़ने वाले 17 वर्षीय बेटे ने ऐसा क्यों किया? यही प्रश्न आज भी पुलवामा हमले को अंजाम देने के परिजनों को कचोट रहा है।

सैन्य अधिकारियों का कहना था कि पहले हमला करने वाले आतंकवादी इतने अधिक दुर्जेय अथवा लडाके नहीं होते थे कि वे सैनिक ठिकानों पर हमला करें अथवा खुद को बारूद से उड़ा दें। लेकिन 11 सितंबर को वर्ल्ड ट्रेड सेंटर और पेंटागन पर हमला करने वाले फिदाय्ाीनों के साथ भी कश्मीरी युवकों की गहरी सहानुभूति हो गई थी।

अभी तक य्ाह माना जाता था कि इस तरह के हमलों में केवल निर्दोष लोगों का ही खून बहता है पर बाद में घाटी में नवय्ाुवक य्ाह मानने लगे थे कि अपने उद्देश्य्ा के लिए अपने शिकार के साथ मारे जाने वाले लडाके पवित्र्ा विचारों से प्रेरित होकर ऐसा करते है।

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