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गिरीश्वर मिश्र का ब्लॉग: चुनाव सुधार करना वर्तमान समय की मांग

By गिरीश्वर मिश्र | Updated: February 19, 2020 06:55 IST

लोकतंत्न के स्वास्थ्य की रक्षा और देश के व्यापक हित में यह  आवश्यक है कि हमारे जनप्रतिनिधि वास्तव में जनता के हों और जनता के हित के लिए कार्य करें.

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उच्चतम न्यायालय ने आपराधिक मामलों में जनप्रतिनिधियों की दिनोंदिन बढ़ती संलग्नता को संज्ञान में लेकर गंभीर रुख अपनाया है.  उसने जो ताजा निर्देश जारी किए हैं वे आज के राजनीतिक परिवेश में व्यापक बदलाव की जरूरत को रेखांकित करते हैं. यह प्रसन्नता की बात है कि निर्वाचन आयोग ने  इसका स्वागत किया है और  अब वह प्रत्याशियों के लिए नए नैतिक मानदंडों को तैयार करने की दिशा में कार्य शुरू करने वाला है.

उल्लेखनीय है कि कभी राजनीति में प्रवेश लेना उस व्यक्ति के लिए ही संभव होता था जो सेवा, सदाचार और त्याग की भावनाओं से प्रेरित हो. वह व्यक्ति कुछ पाने की या किसी तरह की प्रत्याशा रखे बिना ही कुछ करना चाहता था. समाज के लिए नि:स्वार्थ कार्य करने की परंपरा स्वराज की लड़ाई के जमाने से शुरू हुई थी. तब कई तरह के खतरों  की अनदेखी करते हुए देश के साथ अनुराग होने के कारण लोग देश का काम करते थे. देशभक्ति एक तरह के सामाजिक योग की साधना जैसी थी. नेता बनने वालों और सार्वजनिक जीवन में आने की इच्छा रखने वालों में चरित्न, नैतिकता और लोक कल्याण पर विशेष रूप से बल दिया जाता था. देश को स्वतंत्नता मिलने के बाद इन मूल्यों में गिरावट आनी शुरू हुई जो पिछले दशकों में तेजी से बढ़ी है.

लोकतंत्न के स्वास्थ्य की रक्षा और देश के व्यापक हित में यह  आवश्यक है कि हमारे जनप्रतिनिधि वास्तव में जनता के हों और जनता के हित के लिए कार्य करें. इस दृष्टि से सोचने और चुनाव के स्वभाव की जटिलता को देखते हुए उसकी प्रक्रिया में प्रभावी हस्तक्षेप ही एकमात्न उपाय दिखता है. सभी पक्षों को देखते हुए व्यापक चुनावी सुधार के लिए पहल अब जरूरी हो गई है.

इस दृष्टि से मुख्य रूप से  विचारणीय मुद्दे इस प्रकार हैं जिन पर सम्यक विचार कर अविलंब कारगर नीति अपनाई  जाए :  चुनावी खर्च पर नियंत्नण स्थापित करना, चुनाव में मीडिया का विवेकपूर्ण उपयोग, प्रत्याशियों की न्यूनतम शिक्षा की योग्यता निश्चित करना,  आपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों पर राजनीति में भाग लेने पर प्रतिबंध, लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ कराने की व्यवस्था, चुनाव में सभी नागरिकों की अनिवार्य भागीदारी सुनिश्चित करना, काम से असंतुष्ट होने पर जनप्रतिनिधि को जनता द्वारा वापस बुलाने की व्यवस्था, चुनाव घोषणा पत्न को लागू करने के लिए प्रतिबद्धता और ऋण माफी और मुफ्त सुविधाओं को देने की  अनर्गल व्यवस्था  से बचना या उसके लिए जरूरी साधनों का उल्लेख करना जिनसे करदाता पर भार न पड़े.

आशा है सीमित और अल्पकालिक हितों को किनारे रख हमारे नेतागण और नौकरशाही दोनों का ध्यान इस ओर जाएगा और आवश्यक कदम उठाए जाएंगे.

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