अमेरिका में एक लेखक और रेडियो होस्ट हैं माइकल सैवेज. भारत में उन्हें कम ही लोग जानते हैं लेकिन अचानक से वे पूरी दुनिया में चर्चा में आ गए हैं. उनके उस घृणित संदेश को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने सोशल मीडिया पर शेयर कर दिया है जिसमें वे भारत और चीन को नरक बता रहे हैं. वैसे ये माइकल सैवेज किस सोच के व्यक्ति हैं, इसे समझने के लिए 2003 की एक घटना का जिक्र करना जरूरी है. एमएसएनबीसी यानी माइक्रोसॉफ्ट एंड नेशनल ब्राडकास्टिंग कंपनी के एक शो में अपने एक कॉलर को उन्होंने कहा था कि तुम्हें एड्स हो जाए और तुम मर जाओ!
इस घटना के बाद एमएसएनबीसी ने उन्हें नौकरी से निकाल दिया था! वे अप्रवासियों से बहुत खफा रहते हैं. ट्रम्प ने माइकल सैवेज का जो संदेश साझा किया है, वो कुछ इस तरह है....यहां एक बच्चा तुरंत नागरिक बन जाता है और फिर वे पूरे परिवार को चीन या भारत या दुनिया के किसी और नरक से ले आते हैं. यह देखने के लिए आपको ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं है.
यहां अब इंग्लिश नहीं बोली जाती! अब यह सवाल उठ रहा है कि ट्रम्प ने उनका यह घृणित बयान क्यों साझा किया? कहना मुश्किल है क्योंकि ट्रम्प के मन में क्या चल रहा है, यह उन्हें ही पता होता है. हो सकता है कि बाद में बताएं कि ऐसा बयान क्यों साझा किया. लेकिन लोग इस बात की चर्चा जरूर कर रहे हैं कि माइकल सैवेज जैसे व्यक्ति के एक घृणित बयान को साझा नहीं किया जाना चाहिए था.
खुद अमेरिका में ही इस घृणित बयान की बहुत आलोचना हो रही है. कई सांसदों ने भी इसे न केवल पद की गरिमा के खिलाफ बताया है बल्कि नस्लवादी टिप्पणी की खुलेआम आलोचना भी की है. जो लोग ट्रम्प के सिपहसालार हैं वे भी इस प्रसंग से भौंचक हो गए हैं.
स्थिति को संभालने के लिए नई दिल्ली में अमेरिकी दूतावास के प्रवक्ता ने एक समाचार एजेंसी से तत्काल कहा कि राष्ट्रपति ट्रम्प ने कहा है कि भारत एक महान देश है, जहां शीर्ष पद पर मेरे बहुत अच्छे दोस्त हैं. निश्चय ही उस बयान में अच्छे दोस्त से उनका आशय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से है. मगर लोग सवाल पूछ रहे हैं कि इस तरह का बयान ट्रम्प पहले देते रहे हैं.
लेकिन क्या माइकल सैवेज का संदेश शेयर करने के बाद उन्होंने इस तरह की कोई बात कही है? स्वाभाविक रूप से भारत और चीन को नरक बताने वाले संदेश की घनघोर मुखालफत हो रही है. मुहावरों की भाषा में कहें तो भारत में विपक्षी दल सरकार से ईंट का जवाब पत्थर से देने की मांग कर रहे हैं.
इस बीच भारत ने कहा है कि ऐसी टिप्पणियां अनुचित हैं और भारत-अमेरिका संबंधों की असलियत को नहीं दर्शातीं, जो लंबे समय से आपसी सम्मान और साझा हितों पर आधारित रहे हैं. मुझे लगता है कि भारत का संयमित रुख ठीक है क्योंकि दूसरों को जवाब देते हुए हम अपनी गरिमा क्यों खोएं? चीन ने भी ऐसा ही किया है.
भारत में चीनी दूतावास की प्रवक्ता यू जिन ने एक्स पर भारत और चीन का झंडा एक साथ रखते हुए लिखा है कि वायरल शब्द फीके पड़ जाते हैं. असली पार्टनरशिप फीकी नहीं पड़ती. द्विपक्षीय संबंध बयानबाजी नहीं, बल्कि आपसी सम्मान पर टिके होते हैं. यानी भारत और चीन ने जवाब देते हुए भाषायी गरिमा बनाए रखी है.
अब चलिए एक काल्पनिक स्थिति पर चर्चा करते हैं कि माइकल सैवेज की इच्छा किसी दिन वाकई पूरी हो जाए. और कुछ इस तरह पूरी हो जाए कि वहां कोई अप्रवासी रहे ही नहीं तो फिर अमेरिका कैसा होगा? हालांकि ऐसा होना संभव नहीं है लेकिन उनकी चाहत के अनुरूप कल्पना करने में क्या हर्ज है? अमेरिका की आबादी करीब-करीब 35 करोड़ पर पहुंचने वाली है.
इसमें अप्रवासियों की संख्या करीब 5 करोड़ है. यानी प्रत्येक 7 में से एक व्यक्ति अप्रवासी है. इसमें एक करोड़ से ज्यादा लोग मैक्सिको के हैं. करीब-करीब 55 लाख भारतीय हैं और चीनी मूल के लोगों की संख्या भारतीय मूल के लोगों से संभवत: थोड़ी ही कम है. यदि अप्रवासियों को पूरी तरह हटा दें तो अमेरिका की आबादी 30 करोड़ रह जाएगी.
मूल अमेरिकियों में जन्म दर कम है और अमेरिकी कांग्रेस के बजट ऑफिस का आकलन है कि कम जन्म दर और बुजुर्गों की बढ़ती आबादी का असर यह होगा कि 2040 में ऐसी स्थिति आएगी कि हर साल जन्म कम होगा और मौतें ज्यादा होंगी. आकलन यह भी है कि यदि अप्रवासियों को पूरी तरह हटा दिया जाए तो प्रति व्यक्ति जीडीपी में दस प्रतिशत तक गिरावट आ सकती है.
कुछ और आंकड़ों पर गौर कीजिए. सिविल सेक्टर में काम करने वाले करीब तीन करोड़ लोगों में 19 प्रतिशत अप्रवासी हैं. कृषि का कुछ हिस्सा तो अप्रवासियों पर ही निर्भर है. नेशनल एग्रीकल्चरल वर्कर्स सर्वे बताता है कि खेतों में काम करने वाले 70 प्रतिशत मजदूर अप्रवासी हैं. अमेरिका जिस सिलिकॉन वैली पर नाज करता है, वह भारतीयों की मेहनत और काबिलियत के कारण संभव हुआ है.
आपको पता ही होगा कि जो एप्पल अमेरिका की शान है उसे सीरियाई अप्रवासी के बेटे स्टीव जॉब्स ने स्थापित किया. अमेरिका की 500 बड़ी कंपनियों में से करीब 45 प्रतिशत कंपनियां अप्रवासियों या उनके बच्चों ने स्थापित की थी. एक अरब डॉलर से अधिक राजस्व वाले 55 प्रतिशत स्टार्टअप की शुरुआत अप्रवासियों ने की.
और इस आंकड़े पर भी नजर डालिए कि भारतीय मूल के लोग अमेरिका में हर साल 250 से 300 अरब डॉलर का टैक्स भरते हैं. यह अमेरिका के कुल टैक्स का 5 से 6 प्रतिशत होता है. इसलिए माइकल सैवेज जैसे लोग जब भारत को नरक कहने की निर्लज्जता दिखाते हैं तो यह मान लेने में कोई हर्ज नहीं है कि उनका दिमाग खराब है!
ऐसे बददिमाग लोग दुनिया के हर हिस्से में मिल जाएंगे और इनकी बातों को तवज्जो देने का कोई मतलब भी नहीं है. वास्तव में मैंने माइकल के नरक वाले बयान पर केवल इसलिए लिखा क्योंकि मामला चर्चित हो गया है. हम व्यापक सोच वाले लोग हैं. हमारी सोच वसुधैव कुटुम्बकम की है. हम माइकल सैवेज जैसे खिसके हुए लोगों की परवाह नहीं करते.