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अभय कुमार दुबे का ब्लॉग: बिखरा विपक्ष नहीं दे पाएगा भाजपा को चुनौती

By अभय कुमार दुबे | Updated: September 27, 2023 10:15 IST

अखिलेश ने पिछड़ी जातियों का एक गुलदस्ता तैयार करने में कामयाबी हासिल की और मुसलमान वोटों के भीतर मौजूद किसी भी तरह के ढुलमुलपन को भी खत्म करके उनका सर्वांग समर्थन जीत लिया. 

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ठळक मुद्देजातियों के बहुसंख्यकवाद की दूसरी प्रतिनिधि बसपा जाटव और अन्य दलित वोटों को छोड़ कर हर मानक पर फिसड्डी साबित हुई.भाजपा को उम्मीद है कि विपक्ष के बंटे रहने के कारण वह उत्तर प्रदेश में लोकसभा की सीटें 63 से बढ़ा कर 75 तक ले जा सकती है.उसके इस लक्ष्य में केवल अखिलेश, मायावती और राहुल का गठजोड़ ही बाधा बन सकता है.

2024 के लोकसभा चुनाव के संदर्भ में समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव को तीन सवालों का जवाब तलाशना है. क्या वे उत्तर प्रदेश की जनता को विश्वास दिला पाएंगे कि विपक्षी गठजोड़ भाजपा का विकल्प राष्ट्रीय स्तर पर दे सकता है? दूसरे, क्या वे एक बार फिर लोकसभा चुनाव के संदर्भ में पिछड़े वर्ग की एकता का वैसा ही गुलदस्ता पेश कर पाएंगे जो उन्होंने विधानसभा चुनाव में किया था? 

तीसरे, उन्हें यह पूर्वानुमान भी लगाना है कि मायावती का रुख क्या होता है. जाहिर है कि अगर मायावती ने स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ने का फैसला किया तो केवल कांग्रेस से गठजोड़ के दम पर उनके लिए भाजपा को रोकना मुमकिन नहीं होगा. अखिलेश यादव ने बयान दिया है कि भाजपा के खिलाफ विपक्ष के संयुक्त उम्मीदवार खड़ा करने के सिलसिले में उनकी तरफ से कोई दिक्कत नहीं आने वाली है. 

वे किसी गठजोड़ पार्टनर को सीटें देने में कोई दिक्कत पैदा नहीं करेंगे. उन्होंने यह भी कहा कि लोकसभा का चुनाव एक बड़ी लड़ाई है, और छोटी-छोटी बातों से उसे गड़बड़ाया नहीं जा सकता. जाहिर है कि उनके इस वक्तव्य से विपक्षी गठबंधन आईएनडीआईए को बहुत तसल्ली हुई होगी. इस वक्तव्य का सकारात्मक संदेश न केवल कांग्रेस को मिला होगा, बल्कि गठजोड़ से बाहर बैठी हुई मायावती को भी गया होगा. 

अब मायावती को केवल विधानसभा चुनाव के नतीजों का इंतजार रहेगा. अगर वहां कांग्रेस ठप्पे के साथ जीतती है तो विपक्षी एकता को जो उछाल मिलेगा, उसमें मायावती अपना फायदा भी देख सकती हैं. हालांकि भाजपा पूरी कोशिश करेगी कि मायावती विपक्ष के साथ न जा पाएं, लेकिन अगर मायावती ने इस तरह का मन बनाया तो भाजपा के लिए लोकसभा चुनाव में मुश्किलें बहुत बढ़ जाएंगी.

सपा की वोट प्रतिशत के मामले में सबसे बड़ी सफलता दस साल बाद 2022 में सामने आई जब इसने विधानसभा चुनाव में अपने इतिहास में सर्वाधिक 32.06 प्रतिशत वोट हासिल किए. यह अलग बात है कि अपने सबसे ज्यादा बेहतरीन प्रदर्शन और सीटों की सम्मानजनक संख्या के बावजूद वह सरकार बनाने से काफी दूर रह गई. सपा ने अपने तीन दशक लंबे वजूद में और भी कई चुनाव लड़े हैं. 

2022 के आंकड़े समाजवादी पार्टी के आज तक के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन की विडंबनापूर्ण कहानी कहते हैं. 32.06 प्रतिशत वोटों के समर्थन की सामाजिक रचना पर यादव और मुसलमान वोटों का असाधारण ध्रुवीकरण बेतहाशा हावी दिखता है. 

कुर्मी-कोइरी और अन्य पिछड़ी जातियों के भी सम्मानजनक वोट मिलते हुए दिखते हैं. स्पष्ट है कि अखिलेश यादव के नेतृत्व में हुआ यह पहला विधानसभा चुनाव रणनीतिक दृष्टि से अंशत: सफल होते हुए भी लक्ष्य से बहुत दूर (सिर्फ 111 सीटें) रह गया. 

अखिलेश ने पिछड़ी जातियों का एक गुलदस्ता तैयार करने में कामयाबी हासिल की और मुसलमान वोटों के भीतर मौजूद किसी भी तरह के ढुलमुलपन को भी खत्म करके उनका सर्वांग समर्थन जीत लिया. 

लेकिन, वे भाजपा की राज्य सरकार से ब्राह्मण समुदाय की नाखुशी, सरकार द्वारा खुल कर चलाए जा रहे ठाकुरवाद, कोविड महामारी के दौरान हुई बदइंतजामी, किसान आंदोलन से बनी पश्चिमी उत्तर प्रदेश की नाराजगी और आवारा पशुओं से किसानों को होने वाली समस्याओं का कोई लाभ नहीं उठा पाए.

सरकार के खिलाफ एक ठीकठाक किस्म की ‘एंटीइनकम्बेंसी’ थी जो इन सभी पहलुओं को मिला कर देखने पर सीएसडीएस-लोकनीति के चुनाव-उपरांत सर्वे में साफ दिखाई देती है.

इसके बावजूद समाजवादी पार्टी ब्राह्मण, वैश्य, ठाकुर, भूमिहार और जाटों के वोटों के मामले में अपने पिता द्वारा सपा की तरफ खींची गई उस सामाजिक संरचना को दोहराने में विफल रही. इसी के दम पर अखिलेश 2012 में मुख्यमंत्री बने थे. इसका दूसरा बड़ा कारण यह कि भाजपा अपने वोटों को 2017 में अगर 39.65 प्रतिशत तक ले गई थी, तो 2022 में एंटीइनकम्बेंसी के बावजूद उसके वोट इससे भी ज्यादा बढ़ कर 41.29 पर पहुंच गए. 

यानी, हिंदुत्ववादी बहुसंख्यकवाद की गोलबंदी ने तीस प्रतिशत के आसपास वोट प्राप्त करके बहुमत हासिल करने की परंपरा को अतीत की वस्तु बना दिया. इस लिहाज से जातियों के बहुसंख्यकवाद की राजनीति ने भी इस चुनाव में अपना सर्वश्रेष्ठ दिखाया, और हिंदुत्ववादी बहुसंख्यक वाद की राजनीति ने भी. जातियों के बहुसंख्यकवाद की दूसरी प्रतिनिधि बसपा जाटव और अन्य दलित वोटों को छोड़ कर हर मानक पर फिसड्डी साबित हुई. 

सपा इसकी अकेली उल्लेखनीय प्रतिनिधि जरूर रह गई, लेकिन हिंदुत्व अपनी कई तरह की प्रशासनिक विफलताओं के बावजूद नौ फीसदी से आगे रहा, जो बहुत बड़ी बढ़त थी. भाजपा को उम्मीद है कि विपक्ष के बंटे रहने के कारण वह उत्तर प्रदेश में लोकसभा की सीटें 63 से बढ़ा कर 75 तक ले जा सकती है. उसके इस लक्ष्य में केवल अखिलेश, मायावती और राहुल का गठजोड़ ही बाधा बन सकता है.

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