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पंकज चतुव्रेदी का ब्लॉग: पूर्वोत्तर भारत में दिख रहे हैं चीन के नापाक इरादे

By पंकज चतुर्वेदी | Updated: February 28, 2022 15:30 IST

अरुणाचल प्रदेश को लेकर चीन समय-समय पर घुसपैठ और बयानबाजी करता रहा है और अब वह इस इलाके में अस्थिरता के लिए छोटे आतंकी गुटों को शह दे रहा है। बीते कुछ सालों में अलगाववादी संगठनों पर बढ़े दबाव और उनके साथ हुए समझौतों ने माहौल को शांत बनाया है।

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ठळक मुद्देयह बात चिंताजनक है कि अस्थिर म्यांमार के रास्ते चीन अलगाववादियों को फिर से हवा-पानी दे रहा है।अरुणाचल प्रदेश को लेकर चीन समय-समय पर घुसपैठ और बयानबाजी करता रहा है और अब वह इस इलाके में अस्थिरता के लिए छोटे आतंकी गुटों को शह दे रहा है।

भारत के आठ पूर्वोत्तर राज्यों की नब्बे प्रतिशत सीमा तिब्बत, म्यांमार, भूटान और बांग्लादेश को छूती है। इस तरह यह बेहद संवेदनशील इलाका है, हालांकि साल 2014 की तुलना में यहां आज आतंकी घटनाओं में अस्सी फीसदी की कमी आई है, नागरिकों की हत्या की घटनाएं 99 प्रतिशत कम हुईं, साथ ही सुरक्षा बालों की शहादत में भी 75 प्रतिशत की कमी आई है। इसके बावजूद यह बात चिंताजनक है कि अस्थिर म्यांमार के रास्ते चीन अलगाववादियों को फिर से हवा-पानी दे रहा है, बांग्लादेश के रास्ते पाकिस्तान तो इधर पहले से ही गड़बड़ियां करता रहा है। 

अरुणाचल प्रदेश को लेकर चीन समय-समय पर घुसपैठ और बयानबाजी करता रहा है और अब वह इस इलाके में अस्थिरता के लिए छोटे आतंकी गुटों को शह दे रहा है। बीते कुछ सालों में अलगाववादी संगठनों पर बढ़े दबाव और उनके साथ हुए समझौतों ने माहौल को शांत बनाया है। 23 फरवरी 2021 को किए गए कार्बी आंगलान समझौते, 10 अगस्त 2019 के एनएलएफटी त्रिपुरा समझौते, 27 जनवरी 2020 के बोडो समझौते से माहौल बदला है। बीते दो सालों में 3922 आतंकियों ने आत्मसमर्पण किया। 

हालांकि हमारी सेना ने म्यांमार में घुस कर आतंकियों के अड्डे नष्ट किए लेकिन बीते दो वर्षो में उग्रवादियों ने भी सेना पर कुछ बड़े हमले किए हैं। यह भी सच है कि म्यांमार में सैनिक शासन के बाद चीन व म्यांमार सीमा क्षेत्नों में विद्रोही फिर संगठित हो रहे हैं। म्यांमार को यह नागवार गुजरा है कि उसके देश के कोई बीस हजार राजनीतिक कार्यकर्ताओं और सेना विरोधी कर्मचारियों को भारत ने एक साल से सुरक्षित पनाह दे रखी है।

असम राइफल्स के पूर्व आईजी मेजर जनरल भबानी एस दास के अनुसार पूर्वोत्तर के कई अलगाववादी नेता अपना ठिकाना चीन में बनाए हुए हैं, जिनमें यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (आई), पीपल्स लिबरेशन आर्मी ऑफ मणिपुर और नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड (के) से टूटे धड़े के विद्रोही शामिल हैं। बीएसएफ के रिटायर्ड एडीजी संजीव कृष्ण सूद के अनुसार बेशक चीन की भूमिका को अनदेखा नहीं कर सकते, लेकिन शांति वार्ता में अनसुलड़ो मुद्दों की वजह से भी नगा समूह भड़के हुए हैं। 

मॉरीशस के पूर्व एनएसए रहे आईपीएस शांतनु मुखर्जी के अनुसार उल्फा (आई) नेता परेश बरुआ चीन में अवैध हथियारों की मंडी के रूप में कुख्यात कुन्मिंग राज्य में छिपा है। पहले वह म्यांमार सीमा के निकट चीनी शहर रुइल में छिपा था। यह किसी से छुपा नहीं है कि नगा विद्रोह के बाद अलगाववादियों को 70 के दशक में चीन में ही प्रशिक्षण और हथियार मिलते थे। कई जनजातीय विद्रोही उत्तरी म्यांमार के क्षेत्नों को माओ के मॉडल पर ग्रेटर नगालिम में शामिल करने के लिए हथियार उठाए हुए हैं।

याद करना होगा कि 1975 में भारत सरकार और नगा नेशनल काउंसिल के बीच शिलॉन्ग समझौते का एसएस खापलांग और थिंगालेंग शिवा जैसे नेताओं ने विरोध किया था, जो तब ‘चाइना रिटर्न गैंग’ कहलाते थे। 1980 में खापलांग और मुइवा ने मिलकर नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालिम (एनएससीएन) का गठन किया था। आठ साल बाद 1988 में इसाक मुइवा ने चिशी स्वू के साथ एनएससीएन (आई-एम) गुट का गठन किया, जबकि खापलांग ने अपने गुट को एनएससीएन (के) नाम दिया। 

ये सभी गिरोह अपने परिवार के साथ चीन में आलीशान जिंदगी जी रहे हैं और युवाओं को अलग राज्य का झांसा देकर म्यांमार में उनकी ट्रेनिंग करवाते रहते हैं। जिस तरह से उत्तर-पूर्वी राज्यों के उग्रवादी अत्याधुनिक हथियारों तथा उसके लिए जरूरी गोला-बारूद से लैस रहते हैं इससे यह तो साफ है कि कोई तो है जो दक्षिण-पूर्व एशिया में अवैध संवेदनशील हथियारों की खपत बनाए रखे हुए है। बंदूक के बल पर लोकतंत्न को गुलाम बनाने वालों को हथियार की सप्लाई म्यांमार, थाईलैंड, भूटान, बांग्लादेश से हो रही है।

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