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Census: पहली जनगणना में आई थीं ढेरों चुनौतियां?, श्रीगणेश 20 फरवरी 1951 को हुआ था

By विवेक शुक्ला | Updated: June 16, 2025 08:16 IST

Census: भारत में 16 साल बाद फिर से जनसंख्या की गणना कराई जाएगी. राष्ट्रीय जनगणना की अधिसूचना आज 16 जून को जारी होगी.

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ठळक मुद्देजनगणना 1 मार्च 2027 को पूरी होगी. देश में जनगणना कराना बहुत बड़ी चुनौती रही है. जनगणना 1948 के जनगणना अधिनियम के तहत हुई,

Census: देश की पहली जनगणना का श्रीगणेश 20 फरवरी 1951 को हुआ था. उस दिन भारत के राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद से सारी जानकारी भारत के जनगणना उपायुक्त रामेश्वर दयाल ने राष्ट्रपति भवन में जाकर हासिल की. डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने अपनी उम्र 66 वर्ष, पेशा ‘राष्ट्रपति’ बताया और कहा कि उन्हें हिंदी के अलावा अंग्रेजी व बांग्ला भाषा आती हैं. उनके बाद उनकी पत्नी राजवंशी देवी से जानकारी ली गई थी. भारत में 16 साल बाद फिर से जनसंख्या की गणना कराई जाएगी. राष्ट्रीय जनगणना की अधिसूचना आज 16 जून को जारी होगी. जनगणना 1 मार्च 2027 को पूरी होगी.

भारत जैसे विशाल देश में जनगणना कराना बहुत बड़ी चुनौती रही है. देश के आजाद होने के बाद इंडियन सिविल सेवा (आईसीएस) के मद्रास कैडर के तेजतर्रार अफसर आर.ए. गोपालस्वामी के नेतृत्व में पहली बार 1951 में जनगणना करवाई गई थी, जो 1872 से हर दस साल में होने वाली नौवीं जनगणना थी. यह जनगणना 1948 के जनगणना अधिनियम के तहत हुई,

जिसने भारत में जनगणना की प्रक्रिया को औपचारिक और कानूनी रूप दिया. गोपालस्वामी ने डब्ल्यू.डब्ल्यू.एम. येट्स की जगह ली, जिन्हें 1951 की जनगणना के लिए नियुक्त किया गया था, लेकिन 1948 में उनकी मृत्यु हो गई थी. सरकार ने गोपालस्वामी को 1949 में स्वतंत्र भारत का पहला जनगणना आयुक्त नियुक्त कर दिया था. वे भारतीय सिविल सेवा के 1927 बैच के अफसर थे.

कुछ सालों तक मौजूदा तमिलनाडु में अहम पदों पर रहने के बाद वे 1940 में नई दिल्ली आ गए थे. यहां वे कृषि विभाग में भी रहे. गोपालस्वामी के मार्गदर्शन में 1951 की जनगणना में उम्र, लिंग, वैवाहिक स्थिति, धर्म, शिक्षा और पेशे जैसे सामाजिक और आर्थिक आंकड़े जुटाए गए. जनगणना के अनुसार भारत की आबादी 36.10 करोड़ थी, जिसमें पुरुष-महिला अनुपात 1000:946 था.

साक्षरता दर 18% थी और औसत आयु 32 साल थी. इसके अलावा, विभाजन के कारण हुए विस्थापन का भी डाटा दर्ज किया गया, जिसमें 72.26 लाख मुस्लिम पाकिस्तान गए और 72.49 लाख हिंदू और सिख भारत आए. इस डाटा ने आजाद भारत की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को समझने की नींव रखी.

बेशक, 1951 की जनगणना, जिसे ‘स्वतंत्रता जनगणना’ भी कहा जाता है, आजादी के बाद भारत के लिए एक महत्वपूर्ण पड़ाव थी. गोपालस्वामी ने गणना को लोकतांत्रिक तरीके से कराने में अहम भूमिका निभाई, ताकि यह पूरे देश में व्यवस्थित ढंग से हो सके. यह ब्रिटिश शासन की जनगणनाओं से बिल्कुल अलग थी, जो मुख्य रूप से प्रशासन और राजस्व के लिए होती थीं.

1951 की जनगणना ने भारत में डाटा आधारित शासन की नींव रखी. दरअसल 1951 की जनगणना में कई चुनौतियां थीं, जैसे कम साक्षरता दर (केवल 18%) और देश की विशालता और विविधता के कारण लॉजिस्टिक समस्याएं. गोपालस्वामी ने इन बाधाओं के बावजूद व्यवस्थित तरीके से जनगणना सुनिश्चित की. जम्मू-कश्मीर में अस्थिरता के कारण वहां 1951 में जनगणना नहीं हो सकी, और वहां की आबादी का अनुमान 1941 की जनगणना के आधार पर लगाया गया.

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