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रहीस सिंह का ब्लॉगः चर्चा कश्मीर पर ही क्यों, हांगकांग पर क्यों नहीं?

By रहीस सिंह | Updated: August 27, 2019 08:31 IST

कश्मीर मुद्दा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में उठ सकता है तो फिर हांगकांग का मुद्दा क्यों नहीं? क्या भारत को काउंटर डिप्लोमेसी के तहत इस दिशा में कुछ कदम उठाने चाहिए

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ठळक मुद्देक्या चीन में ऐसे कोई आंतरिक मुद्दे नहीं हैं जिन्हें भारत अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उठाकर चीन पर मनोवैज्ञानिक दबाव बना सके?हांगकांग लोकतंत्र और स्वतंत्रता के मूल्यों की पुनस्र्थापना के लिए लड़ रहा है

पिछले काफी समय से दुनिया के सर्वाधिक सक्रिय आर्थिक केंद्रों में से एक हांगकांग पिछले काफी समय से न थमा हुआ है और न ही चल रहा है. पिछले काफी दिनों से उसकी सड़कें दसियों लाख लोगों की गतिमान भीड़ से भरी हैं जो अपने विभिन्न प्रकार के नारों या तख्तियों पर लिखे स्लोगन लिए सक्रिय दिखाई दे रहे हैं. ये सभी हांगकांग के मौलिक स्वरूप, उसके लोकतंत्र और अभिव्यक्ति के मूल्यों के संरक्षण के लिए लड़ रहे हैं, लेकिन न ही दुनिया के मंचों पर इसकी प्रतिध्वनि सुनाई दी और न संयुक्त राष्ट्र में. जबकि जम्मू-कश्मीर के मुद्दे को लेकर मामला संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में पहुंच गया.

आखिर क्यों? कश्मीर मुद्दा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में उठ सकता है तो फिर हांगकांग का मुद्दा क्यों नहीं? क्या भारत को काउंटर डिप्लोमेसी के तहत इस दिशा में कुछ कदम उठाने चाहिए?चीन कश्मीर मामले पर न केवल अमेरिकी मध्यस्थता का समर्थन करता है बल्कि वह इस मुद्दा पर खुले तौर पर पाकिस्तान के साथ खड़ा है.  

सवाल यह उठता है कि क्या चीन सही ट्रैक पर है? क्या चीन में ऐसे कोई आंतरिक मुद्दे नहीं हैं जिन्हें भारत अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उठाकर चीन पर मनोवैज्ञानिक दबाव बना सके?क्या पाकिस्तान में ऐसे कोई आंतरिक मसले मौजूद नहीं हैं जिन्हें लेकर भारत एक वैश्विक मुहिम चला सके? सभी के पास हैं और वे स्थिति व प्रकृति में जम्मू-कश्मीर से कहीं अधिक जटिल हैं. लेकिन इसके लिए भारत को डुअल ट्रैक स्ट्रेटेजी पर काम करना होगा.

पहली यह कि अपने कदमों को पुख्ता तरीके से संरक्षित करना और दूसरी कुछ देशों को अपने साथ लेकर वैश्विक फलक पर उन मुद्दों को उठाना जो चीन, पाकिस्तान, ब्रिटेन और अमेरिका में मुख्य मानवीय विषय बने हुए हैं.अगर हम अनुच्छेद 370 के हटाने संबंधी बात करें जिसे लेकर पाकिस्तान हो-हल्ला मचा रहा है और चीन उसे सुर देने की कोशिश कर रहा है, तो वह किसी अंतर्राष्ट्रीय संधि का परिणाम नहीं था. वह भारतीय संप्रभुता का निर्णय और संविधान का अंग था जिसे हटाने के लिए संविधान में ही प्रावधान किया गया था.

इसके विपरीत प्राय: न्यूयॉर्क में ‘बलूचिस्तान में मानवाधिकारों का उल्लंघन बंद करो’, ‘बलूचिस्तान में बमबारी बंद करो’ और ‘बलूचिस्तान पाकिस्तान नहीं है’ जैसे नारे लगते रहते हैं. लेकिन न ही अमेरिका के कानों पर जूं रेंगती है और न ही चीन के. रही बात चीन की तो वहां शिंङिायांग, तिब्बत की स्थायी चुनौतियां तो मजबूत हैं ही जिन्हें पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना ने सेना के बल पर कब्जे में कर रखा है लेकिन इस समय हांगकांग एक ऐसा बर्निग टॉपिक है जिस पर चीन को कुछ हद तक कमजोर पड़ते हुए देखा भी गया है.

बहरहाल हांगकांग लोकतंत्र और स्वतंत्रता के मूल्यों की पुनस्र्थापना के लिए लड़ रहा है. लेकिन अमेरिका सहित दुनिया के तमाम देशों के पास इतना साहस नहीं है कि हांगकांग आंदोलन को खुला समर्थन दे सकें, भले ही वे रेस्टोरेशन ऑफ डेमोक्रेसी के नाम पर इराक सहित दुनिया के तमाम देशों व व्यवस्थाओं को ध्वंस कर चुके हों. भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है इसलिए भारत से ऐसे आंदोलन यह अपेक्षा कर सकते हैं कि भारत उन्हें अपना समर्थन दे. तो क्या भारत ऐसा कर पाएगा? क्या भारत को ऐसा करना चाहिए?

टॅग्स :जम्मू कश्मीर
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