सुंबली मावस उत्सव: घाटी में गूंजी पुरानी आवाजें, 37 साल बाद कश्मीरी पंडितों ने अपनी मिट्टी को चूमा
By सुरेश एस डुग्गर | Updated: May 17, 2026 12:03 IST2026-05-17T12:02:20+5:302026-05-17T12:03:10+5:30
Jammu and Kashmir: उनकी वापसी हमें हमारी साझा परंपराओं और पुरानी यादों से दोबारा जोड़ती है।

सुंबली मावस उत्सव: घाटी में गूंजी पुरानी आवाजें, 37 साल बाद कश्मीरी पंडितों ने अपनी मिट्टी को चूमा
Jammu and Kashmir: तमाम वादों और कोशिशों के बावजूद कश्मीरी पंडितों की कश्मीर वापसी न हो पाने का ही परिणाम था कि कश्मीर में सुंबली मावस उत्सव के लिए 37 सालों के उपरांत कश्मीरी पंडित परिवार कश्मीर तो लौटे पर पर्यटक और श्रद्धालु बन कर।
यह सच हे कि सैकड़ों विस्थापित कश्मीरी पंडित शनिवार को वार्षिक तीन दिवसीय सुंबली मावस उत्सव में भाग लेने के लिए 37 साल बाद उत्तरी कश्मीर के बांडीपोरा जिले के सुंबल इलाके में ऐतिहासिक नंद किशोर मंदिर लौटे थे।
नंद किशोर महाराज की जयंती पर मनाए जाने वाले इस उत्सव में देश के विभिन्न हिस्सों से श्रद्धालु आए, जो प्रार्थना करने, अपनी जड़ों से जुड़ने और पुराने पड़ोसियों और दोस्तों से मिलने के लिए एकत्र हुए।
इस अवसर पर मंदिर परिसर में भावनात्मक दृश्य देखा गया क्योंकि वार्षिक सभा के दौरान कई परिवार फिर से एकजुट हुए, जिसे समुदाय के सदस्यों ने स्मरण और सांप्रदायिक सद्भाव का प्रतीक बताया।
अधिकारियों ने उत्सव के सुचारू संचालन के लिए व्यापक सुरक्षा और प्रशासनिक व्यवस्था की थी। कार्यक्रम के दौरान वरिष्ठ पुलिस और नागरिक प्रशासन के अधिकारी मौजूद रहे।
आने वाले कई श्रद्धालुओं ने कहा कि दशकों बाद घाटी में लौटना एक भावनात्मक अनुभव था। कश्मीर के बाहर से आने वाले एक श्रद्धालु सुनील कौल कहती थीं कि हम इतने वर्षों के बाद अपनी मातृभूमि में लौटकर खुश हैं। हमारे मुस्लिम पड़ोसियों ने हमारी अनुपस्थिति में इस मंदिर की देखभाल की और हम हमेशा उनके आभारी रहेंगे।
एक अन्य भक्त, रमेश भट्ट के बकौल, पैतृक गांव लौटने और पुराने पड़ोसियों से मिलने से पुराने समय की यादें ताजा हो गईं। वे कहते थे कि दशकों के बाद घर लौटना सबसे अच्छा अहसास है। अपने पैतृक मंदिर में प्रार्थना करना हमारे दिलों को भावनाओं से भर देता है।
उत्सव में भाग लेने वाले एक अन्य प्रतिभागी अशोक कुमार कहते थे कि वार्षिक सभा ने विस्थापित समुदाय को कश्मीर के साथ अपना संबंध बनाए रखने में मदद की। उनका कहना था कि कोई फर्क नहीं पड़ता कि हम कहां रहते हैं, हमारी जड़ें यहीं हैं। हर साल वापस आने से हमारी परंपराएं और यादें जीवित रहती हैं।
स्थानीय लोगों ने आने वाले परिवारों का स्वागत किया और उत्सव की व्यवस्था में सहायता की। सुंबल निवासी राठेर मेहराज कहते थे कि पंडित हमारे परिवार का हिस्सा हैं। उनकी वापसी हमें हमारी साझा परंपराओं और पुरानी यादों से दोबारा जोड़ती है। जबकि समुदाय के सदस्यों ने कहा कि वार्षिक उत्सव अब कश्मीर में नए सिरे से सांप्रदायिक सद्भाव के लिए मेल-मिलाप और आशा का प्रतीक बन गया है।