सुनील सोनी
‘पर्यावरण व पारिस्थितिकी के जनक’ एलेक्जेंडर वॉन हम्बोल्ट 1859 में जब 90 वर्ष के होकर गुजरे, तब चार्ल्स डार्विन 50 के रहे होंगे. उस दौर में नेपोलियन के बाद यूरोप में कोई सबसे अधिक प्रसिद्ध था, तो हम्बोल्ट थे. जीवन के अंतिम दिनों में उन्हें रोज 5000 से ज्यादा चिट्ठियां आती थीं और उनके छोटे से अपार्टमेंट में वैज्ञानिक उमड़ा करते थे, ताकि नए आइडिया बता सकें.
1799 में हम्बोल्ट ने दक्षिण अमेरिका में 5 साल बिताए और वेनेजुएला के जंगल, ओरिनोको नदी, एंडीज पर्वतमाला, मैक्सिको, क्यूबा में वनस्पतियों, जीवों, भूविज्ञान और मौसम के नमूने और आंकड़े जुटाए. देखा कि जंगल काटने, नदियों का रुख मोड़ने जैसे इंसानों के लालच के कारण वेनेजुएला की वालेंसिया झील सिकुड़ रही है, जो जलवायु परिवर्तन का प्रमाण है.
फिर उन्होंने ‘विराट कविता’ लिखी, जिसका नाम था, ‘पर्सनल नैरेटिव.’ सात खंडों में 1814 में प्रकाशित यह वैज्ञानिक किताब इतनी खूबसूरत जुबान और शैली में लिखी गई कि पढ़कर डार्विन इतने दीवाने हो गए कि कैम्ब्रिज में सहपाठियों-प्राध्यापकों को सुनाते रहते. यह किताब न होती, तो डार्विन 22 साल की उम्र में बीगल नाम के जहाज पर पांच साल की यात्रा पर शायद ही जाते और ‘ऑन द ओरिजिन ऑफ स्पीशीज’ न लिखी जाती.
हालांकि, यह अकेली किताब नहीं थी, जिसे डार्विन ने पढ़ा. दादा इरैस्मस डार्विन की ‘जूनोमिया’, चार्ल्स लायल की ‘प्रिंसिपल ऑफ जियोलॉजी’, जॉन हर्शेल की ‘प्रिलिमिनरी डिस्कोर्स ऑफ द स्टडी ऑफ नेचुरल फिलॉसफी’, विलियम पेली की ‘नेचुरल थियोलॉजी’ और जॉर्ज स्टुअर्ट मिल की ‘ए सिस्टम ऑफ लॉजिक’ ने उनकी जिज्ञासा, अंतर्दृष्टि, समझ और तार्किक क्षमता को बढ़ाया.
फिर भी थॉमस माल्थस की 1798 की उस वक्त चौतरफा निंदा से घिरी किताब ‘एन एस्से ऑफ प्रिंसिपल ऑफ पापुलेशन’ ने वह धागा पकड़ाया, जिस पर उन्होंने ‘प्राकृतिक चयन का सिद्धांत’ लिखा, जिसकी बुनियाद पर आधुनिक जीवविज्ञान खड़ा है.
माल्थस की किताब में दो सिद्धांत थे. पहला जनसंख्या गुणाकार गति से बढ़ती है, जबकि भोजन व संसाधन योगाकार गति से. नतीजतन, युद्ध, महामारी, अकाल से प्रकृति क्रूर संतुलन बनाती है. उनकी किताब इतनी पढ़ी गई कि इंग्लैंड की संसद ने गरीबों को सरकारी मदद देने का कानून ‘पूअर लॉ’ बदल दिया और ‘बिना काम भोजन नहीं’ का नियम और जबरन काम लेनेवाले कारखाने बना दिए. चार्ल्स डिकेंस, विलियम गॉडविन और रॉबर्ट सऊदी ने माल्थस को ‘राक्षस’ करार दे दिया. माल्थस तत्कालीन हालात पर सोच रहे थे, इसलिए उन्होंने इंसानी बुद्धिमत्ता के बारे में नहीं सोचा कि कृषि क्रांति सबके लिए भोजन मुहैया करा देगी और समृद्धि बढ़ेगी तो जनसंख्या भी घटेगी.
उनकी मूल बात सही थी कि संसाधन सीमित हैं और जनसंख्या की प्रवृत्ति असीमित वृद्धि की. यही विचार मौजूदा पर्यावरण विज्ञान, जैव विविधता संरक्षण और जलवायु परिवर्तन की बहस के केंद्र में है.
उनकी किताब पढ़कर डार्विन ने सोचा कि यह अस्तित्व के लिए संघर्ष की बात है, पर समकालीन दार्शनिक कार्ल मार्क्स ने सोचा कि गरीबी प्रकृति नहीं, व्यवस्था का नतीजा है और भोजन कितना भी हो, संसाधनों का असमान बंटवारा उसे सबको मुहैया नहीं होने देता. डिकेंस ने ‘ए क्रिसमस कैरोल’ में माल्थस का किरदार रचकर स्क्रूज से कहलवाया, ‘‘अगर सब गरीब मर जाएं, तो जनसंख्या घटेगी.’’
लेकिन डार्विन ने यह सिद्धांत पूरी प्रकृति पर लागू किया. हर जीव ज्यादा संतानें पैदा करता है, तो उनमें से कुछ ही जीवित क्यों रहती हैं? यानी कोई ऐसा गुण है, जो पहली पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्थानांतरित होता है. यही ‘प्राकृतिक चयन’ है यानी जो परिस्थितियों के अनुकूल हो जाए, वही बचेगा. डार्विन ने और तीन सिद्धांत दिए. पहला, क्रमिक विकास यानी इवोल्यूशन कि कोई भी प्रजाति स्थायी नहीं है; सब बदलते हैं. दूसरा, सभी जीव एक ही मूल से आए हैं और तीसरा कि ईश्वर ने जीवों को नहीं बनाया, प्रकृति ने बनाया है.
जब मार्क्स ने ‘ओरिजिन ऑफ स्पीशीज’ पढ़ी, तो एंगेल्स को लिखा, ‘‘यह वह पुस्तक है, जो हमारे दृष्टिकोण के लिए प्राकृतिक व ऐतिहासिक आधार प्रदान करती है.’’ मार्क्स ने ‘दास कैपिटल’ की प्रति डार्विन को समर्पित करनी चाही, पर डार्विन ने इंकार कर दिया, क्योंकि समाजशास्त्र उनकी दिलचस्पी का विषय नहीं था.
ब्राजील में डार्विन ने दास प्रथा को देखा और कांपते हुए लिखा कि दासों के साथ जो क्रूरता होती है, वह मुझे सोने नहीं देती. अंतत: उनके ‘सभी के पूर्वज एक हैं’ सिद्धांत से यह कुतर्क नष्ट हुआ कि अफ्रीकी जैविक रूप से नीच जाति के हैं. खास है कि डार्विन व अब्राहम लिंकन एक ही दिन पैदा हुए और जब लिंकन ने 1863 में ‘दास प्रथा’ के उन्मूलन की घोषणा की, तो डार्विन उछल पड़े और खुशी से झूमकर उन्हें पत्र लिखा. डार्विन ने खोजा कि मनुष्य जैविक रूप से समान हैं, तो लिंकन ने कहा, फिर वे राजनीतिक रूप से भी समान होने चाहिए और मार्क्स ने कहा, इसलिए वे आर्थिक रूप से भी समान होने चाहिए.
1953 में वॉटसन और क्रिक ने डीएनए की संरचना खोजी, जिसने साबित किया कि सभी जीव एक हैं. चाहे बैक्टीरिया हो या मनुष्य, चाहे केला हो या चिम्पांजी; सबका आनुवंशिक कोड एक ही वर्णमाला में लिखा है : ‘ए, टी, जी, सी’. इंसान और चिम्पांजी का डीएनए 98.7% समान है. मनुष्य और केले का डीएनए भी लगभग 60% एक-सा है. यह साझी उत्पत्ति का प्रमाण है.