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बुतों की पूजा और विचारों की हत्या?, ऐसे ही करेंगे भगत सिंह को नमन?

By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: March 23, 2026 10:41 IST

तर्क, विज्ञान और विवेक की मशाल जलाई थी, आज उसी देश का युवा अंधविश्वास, जातिवाद और संकीर्णता की जंजीरों में जकड़ा हुआ है।

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ठळक मुद्दे'होश' (चेतना) से पूरी तरह कटा हुआ है।भगत सिंह की फोटो वाली टी-शर्ट पहनना फैशन।स्वतंत्र विचार एक क्रांतिकारी के दो अनिवार्य गुण हैं।” पर आज?

विवेक दत्त मथुरिया

​आज 23 मार्च है। कैलेंडर पर लाल निशान है, सोशल मीडिया पर 'इंक़लाब ज़िंदाबाद' के हैशटैग की बाढ़ है और हमारे राजनेताओं के पास श्रद्धांजलियों के रटे-रटाए जुमले हैं। लेकिन इस शोर के बीच, क्या हमें उस 23 साल के नौजवान की पदचाप सुनाई दे रही है, जिसने फांसी के फंदे को चूमने से ठीक पहले 'लेनिन' की जीवनी का पन्ना पलटा था? हमने भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को केवल कैलेंडरों और मूर्तियों में कैद कर दिया है। हमने उन्हें 'शहीद' का दर्जा देकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया है। आज का युवा उनके 'जोश' का कायल तो है, लेकिन उनके 'होश' (चेतना) से पूरी तरह कटा हुआ है।

आजकल सीने पर भगत सिंह की फोटो वाली टी-शर्ट पहनना फैशन है, लेकिन उस सिर के भीतर क्या चल रहा है? जिस भगत सिंह ने 'मैं नास्तिक क्यों हूँ?' लिखकर तर्क, विज्ञान और विवेक की मशाल जलाई थी, आज उसी देश का युवा अंधविश्वास, जातिवाद और संकीर्णता की जंजीरों में जकड़ा हुआ है। भगत सिंह ने कहा था कि “आलोचना और स्वतंत्र विचार एक क्रांतिकारी के दो अनिवार्य गुण हैं।” पर आज?

आज सवाल पूछना 'गुनाह' है और लकीर का फकीर होना 'राष्ट्रभक्ति'। भगत सिंह की सबसे बड़ी चिंता केवल यूनियन जैक को उतारना नहीं थी। उनकी लड़ाई उस व्यवस्था से थी जो इंसान द्वारा इंसान के शोषण पर टिकी थी। उन्होंने चेतावनी दी थी कि अगर सत्ता गोरों के हाथ से निकलकर 'भूरे साहबों' 00पके हाथ में आ गई और व्यवस्था नहीं बदली, तो आज़ादी का कोई अर्थ नहीं।

आज जब हम अपने चारों ओर आर्थिक असमानता की गहरी खाई देखते हैं, जहाँ मुट्ठी भर लोगों के पास देश की संपत्ति है और करोड़ों लोग दो वक्त की रोटी के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं, तो भगत सिंह का 'समाजवाद' चीख-चीख कर हमसे सवाल पूछता है— क्या यही वह आज़ादी है जिसका सपना असेंबली में बम फेंकते समय देखा गया था?

शहीदों को केवल फूल चढ़ाना उनकी याद का अपमान है। अगर वाकई उन्हें नमन करना है, तो उनकी वैज्ञानिक दृष्टि को अपनाना होगा। उस राजनीतिक परिपक्वता को समझना होगा जो 23 साल की उम्र में दुनिया के तमाम दर्शनों को खंगाल चुकी थी। ​भगत सिंह कोई 'एक्शन हीरो' नहीं थे, वे एक 'वैचारिक ज्वालामुखी' थे। और ज्वालामुखी की पूजा नहीं की जाती, उसकी तपिश से अपने भीतर की जड़ता को पिघलाया जाता है। इंक़लाब ज़िंदाबाद—सिर्फ नारों में नहीं, सोच में!

टॅग्स :भगत सिंहपाकिस्तानपंजाब
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