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अवधेश कुमार का ब्लॉगः हिंदुत्व के अतिवादी समर्थकों और विरोधियों को उत्तर

By अवधेश कुमार | Updated: February 15, 2022 16:30 IST

दूरगामी व्यापक लक्ष्यों के साथ अग्रसर कोई संगठन समूह इस तरह के अतिवादी विचार से स्वयं को कभी बांध नहीं सकता। विश्व इतिहास गवाह है कि प्रतिक्रियावादी विचारधारा वाले संगठन या समूहों की आयु बहुत लंबी नहीं होती।

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत द्वारा हाल ही में हिंदुत्व को लेकर अतिवादी आक्रामक बयानों की आलोचना बिल्कुल स्वाभाविक है। हालांकि इससे उस पूरे समूह में नाराजगी है, जो हिंदुत्व के नाम पर अतिवादी विचारों व व्यवहारों के समर्थक हैं। भागवत का यह कहना उन सबको नागवार गुजर रहा है कि धर्म संसद में जो कुछ कहा गया वह हिंदुत्व बिल्कुल नहीं है। भागवत ने लोकमत के नागपुर संस्करण के स्वर्ण महोत्सव के उपलक्ष्य में ‘हिंदुत्व और राष्ट्रीय एकता’ विषय पर नागपुर में आयोजित विशेष व्याख्यान में हिंदुत्व, हिंदू राष्ट्र और अन्य प्रश्नों पर विस्तार से बोला है और यही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार की अधिकृत सोच मानी जाएगी। भागवत ने जो कुछ कहा वह नया नहीं है। दुर्भाग्य से सही समझ, सोच, नेतृत्व और मार्गनिर्देश के अभाव में पिछले कुछ वर्षो में हिंदुत्व की प्रतिक्रियावादी व्याख्या और उसके अनुसार व्यवहार करने वालों का समूह विकसित हुआ है। समस्या यह है कि हमारे देश में जब भी हिंदुत्व के नाम पर प्रतिक्रियावादी समूह या तत्व कुछ बोलते या कदम उठाते हैं तो उसे सीधे-सीधे संघ, भाजपा या पूरे परिवार से जोड़ दिया जाता है।

दूरगामी व्यापक लक्ष्यों के साथ अग्रसर कोई संगठन समूह इस तरह के अतिवादी विचार से स्वयं को कभी बांध नहीं सकता। विश्व इतिहास गवाह है कि प्रतिक्रियावादी विचारधारा वाले संगठन या समूहों की आयु बहुत लंबी नहीं होती। ऐसे लोगों को माहौल के कारण आरंभ में कुछ दिनों तक कुछ लोगों का समर्थन अवश्य मिलता है पर ये स्वयं अपने जीवनकाल में ही कमजोर या अलग-थलग पड़ जाते हैं। अतिवादी घटनाओं की प्रतिक्रियाओं को तात्कालिक जनसमर्थन मिलना स्वभाविक होता है किंतु सतत रूप से प्रतिक्रियावादी बने रहना किसी को भी उस विचारधारा की सच्ची और गहरी समझ से दूर रखता है। 

हालांकि यह दुर्भाग्य एकतरफा नहीं है। हिंदुत्व शब्द का विरोध करने वालों के साथ भी यही समस्या है। वे कतिपय नकारात्मक कारणों से जानबूझकर या अज्ञानता में हिंदुत्व की गहराई और व्यापकता को समझे बिना ही प्रतिक्रियाएं देते हैं। सीधे-सीधे हिंदू धर्म के अलावा अन्य सभी मजहबों और संप्रदायों के विरुद्ध घृणा व नफरत पैदा करने वाली विचारधारा के रूप में हिंदुत्व को व्याख्यायित किया जा रहा है। तस्वीर ऐसी बनाई जाती है मानो हिंदू धर्म की व्यापकता से परे निहायत ही संकुचित फासीवादी आक्रामक तत्वों ने इस विचारधारा को अलग से जन्म दिया है। ये भी अपने विरोध और निंदा में सीमाओं का अतिक्रमण कर नकारात्मक अतिवाद का शिकार हैं। जैसे हिंदुत्व के नाम पर प्रतिक्रियावादी व्यक्तियों या समूह की व्याख्या गलत है वैसी ही इनकी भी। वे कहते हैं कि हमें इसे हिंदू राष्ट्र बनाना है। इनमें कुछ ऐसे तत्व हैं जो वाकई कहते हैं कि हिंदू राष्ट्र का अर्थ यहां केवल एक ही धर्म रहेगा। दूसरी तरफ हिंदुत्व के विरोध में झंडा उठाने वाले भी यही दुष्प्रचार करते हैं कि संविधान से सेक्युलर शब्द हटाकर हिंदू राष्ट्र लिख दिया जाएगा और लाल किले पर तिरंगा की जगह भगवा फहराया जाएगा। इनकी प्रतिक्रि या में वे कहते हैं कि हां ऐसा ही होना चाहिए। धर्म संसदों में दिए गए कई भाषणों में आपको इससे भी आगे की भाषा सुनाई देगी। दुर्भाग्य से हिंदुत्व से अनभिज्ञ या जानबूझकर इसका विरोध करने वालों को निंदा व दुष्प्रचार का आधार मिल जाता है।

भागवत का पूरा वक्तव्य इन दोनों पक्षों को ध्यान में रखते हुए दिया गया लगता है। संघ परिवार की विचारधारा को निष्पक्ष हो समझने वाले मानेंगे कि हिंदू राष्ट्र से उनका अर्थ न संविधान बदलना है और न ही लाल किले या अन्य सरकारी संस्थानों पर तिरंगा हटाकर सीधे भगवा ध्वज फहरा देना है। भागवत ने कहा भी है कि हिंदू राष्ट्र बनाने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि यह हिंदू राष्ट्र है ही। मूल समस्या हिंदू और राष्ट्र शब्द को न समझ पाने के कारण पैदा होती है। राष्ट्र का अभिप्राय ऐसी जीवन प्रणाली से है जो उस क्षेत्न विशेष के लोगों ने अपनाया हुआ है। इस दृष्टि से देखें तो भारत की संपूर्ण जीवन प्रणाली में हिंदुत्व समाहित है।

टॅग्स :मोहन भागवतआरएसएसलोकमत नागपुर
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