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आलोक मेहता का ब्लॉग: बही-खाते में मोटी रकम समस्या खर्च में ढिलाई की

By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: February 3, 2020 05:48 IST

सरकारी आंकड़े इस बात के प्रमाण हैं कि महिला और बाल कल्याण मंत्नालय के अंतर्गत विभिन्न मदों में रखी गई धनराशि का समुचित उपयोग नहीं हो सका. अल्पसंख्यक मंत्नालय के लिए इस साल भी भारी बजट रखा गया है, लेकिन बही-खाता दिखा रहा है कि पिछले बजट से भी अब तक बहुत कम खर्च हुआ. पिछले बजट में अल्पसंख्यकों के कल्याण के  लिए 3289 करोड़ रुपए रखे गए थे, लेकिन 867 करोड़ ही खर्च हुए हैं.

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प्रधानमंत्नी नरेंद्र मोदी लगातार सामाजिक कल्याण और सुधारों को सर्वोच्च प्राथमिकता देने पर बल देते रहे और इस बार भी बजट में सामाजिक, आदिवासी, महिला कल्याण, शिक्षा के क्षेत्नों के लिए 14 प्रतिशत से अधिक धनराशि का प्रावधान किया गया है. लेकिन असली समस्या केंद्र और राज्य सरकार की प्रशासनिक व्यवस्था द्वारा खर्च में ढिलाई से सामान्य लोगों को लाभ नहीं पहुंच पाने की है. इसका कारण लालफीताशाही के अलावा योजनाओं का क्रियान्वयन राज्य सरकारों द्वारा होना तथा जनप्रतिनिधियों की सक्रियता कम होना रहा है.

पिछले बजट के क्रियान्वयन का सरकारी रिकॉर्ड देखिए. सामाजिक कल्याण और सशक्तिकरण मंत्नालय ने अनुसूचित जाति के मैट्रिकोत्तर छात्नों की स्कालरशिप के लिए 2926 करोड़ 82 लाख रुपए की व्यवस्था रखी, लेकिन खर्च केवल 1731 करोड़ यानी 59 प्रतिशत ही किया. बाबू जगजीवन राम छात्नावास योजना के लिए 107 करोड़ का प्रावधान था, लेकिन खर्च सिर्फ साढ़े सात करोड़ रु. हुआ. पिछड़े वर्ग के मैट्रिक पूर्व छात्नों की स्कॉलरशिप के लिए 220 करोड़ रुपए में से केवल 122 करोड़ ही खर्च किए. अनुसूचित जाति वर्ग के मैट्रिक पूर्व छात्नों के लिए निर्धारित 355 करोड़ में से केवल 182 करोड़ रुपए खर्च हुए.

वैसे यह कोई नई बात नहीं है. मनमोहन सिंह की कांग्रेस सरकार में भी इस क्षेत्न में खर्च की ढिलाई का यही हाल था. राज्यों में भाजपा के साथ कांग्रेस की सरकारें भी हैं और पिछड़े आदिवासी वहीं अधिक भी हैं. लेकिन चुने गए प्रतिनिधि या पार्टियों के नेता-कार्यकर्ता लाभ दिलाने के लिए सक्रियता नहीं दिखाते.

सरकारी आंकड़े इस बात के प्रमाण हैं कि महिला और बाल कल्याण मंत्नालय के अंतर्गत विभिन्न मदों में रखी गई धनराशि का समुचित उपयोग नहीं हो सका. अल्पसंख्यक मंत्नालय के लिए इस साल भी भारी बजट रखा गया है, लेकिन बही-खाता दिखा रहा है कि पिछले बजट से भी अब तक बहुत कम खर्च हुआ. पिछले बजट में अल्पसंख्यकों के कल्याण के  लिए 3289 करोड़ रुपए रखे गए थे, लेकिन 867 करोड़ ही खर्च हुए हैं.

इन तथ्यों को देखते हुए लगता है कि प्रधानमंत्नी नरेंद्र मोदी द्वारा समय-समय पर समीक्षा और चेतावनियों के बावजूद मंत्नी, अधिकारी, सांसद योजनाओं का लाभ जनता तक पहुंचाने के प्रयास नहीं करते. 

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