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गिरीश्वर मिश्र का ब्लॉग: मनोभावों के व्याख्याकार, लोकमंगल के विमर्शकार थे आचार्य शुक्ल

By गिरीश्वर मिश्र | Updated: October 4, 2022 11:59 IST

आचार्य शुक्ल ने सौंदर्य के साथ-साथ भावनाओं के अनुभवमूलक पक्ष के महत्व को भी स्वीकार किया। शुक्लजी द्वारा किया गया उत्साह के मनोभाव का विश्लेषण कई मायनों में नया है। यह भावनात्मक स्थिति आनंद की श्रेणी में आती है। 

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ठळक मुद्देबौद्धिक साहस के साथ शुक्लजी ने साहित्यिक आलोचना को नई शब्दावली और मानदंड से लैस करने का प्रयास किया।शुक्लजी की विरासत संपूर्ण मानवता को समाहित करते हुए आलोचना कार्य की सीमाओं का विस्तार करने और लोक मंगल को चर्चा के केंद्र में लाने में निहित है।आचार्य शुक्ल ने 1912 से 1919 के बीच निबंधों की एक श्रृंखला में मनोभावों का एक निर्माणवादी या सर्जनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया।

आज जब उत्तर आधुनिक बहुलता मूलक विमर्शों के कोलाहल के बीच साहित्य की समझ को जानना दुरूह हो रहा है, आचार्य रामचंद्र शुक्ल (4 अक्टूबर 1884-2 फरवरी 1941) का नाम एक सुखद आश्चर्य लगता है। बीसवीं शताब्दी के आरंभ में उन्होंने मनोभावों का एक अनुभवात्मक लेखा-जोखा प्रस्तुत किया था और लोक-मंगल को आलोचनात्मक विमर्श के केंद्र में लाकर हिंदी विमर्श की सांस्कृतिक संवेदनाओं को उस आरंभिक दौर में वह ऊंचाई दी जो आज भी स्पृहणीय बनी हुई है। 

काशी नगरी प्रचार सभा, बनारस में ‘हिंदी शब्द सागर’ और नागरी प्रचारिणी सभा की पत्रिका के संपादन के साथ इतिहास, भाषा और साहित्य के अध्ययन की एक आलोचनात्मक दृष्टि विकसित हुई। उन्होंने 1919 से 1941 तक जीवन पर्यंत बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) में हिंदी का अध्यापन करते हुए हिंदी को एक अध्ययन विषय के रूप में स्थापित किया। वे साहित्य को समाज की चित्त वृत्तियों के प्रतिबिंब के रूप में देखते थे।

आचार्य शुक्ल ने 1912 से 1919 के बीच निबंधों की एक श्रृंखला में मनोभावों का एक निर्माणवादी या सर्जनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया। उन्होंने सौंदर्य के साथ-साथ भावनाओं के अनुभवमूलक पक्ष के महत्व को भी स्वीकार किया। शुक्लजी द्वारा किया गया उत्साह के मनोभाव का विश्लेषण कई मायनों में नया है। यह भावनात्मक स्थिति आनंद की श्रेणी में आती है। 

यह एक ऐसी स्थिति है जिसके भीतर एक प्रत्याशित कठिन स्थिति का साहस के साथ सामना किया जाता है जो कार्य के आनंद का एक प्रवाह प्रदान करता है, और कार्य में संलग्नता में प्रतिफलित होता है। इस प्रकार कार्य में संलग्न होने के लिए जिज्ञासा और खुशी के साथ दुख या हानि सहने की दृढ़ता भी रहती है। शुक्लजी ने समाज की सेवा में कविता के उपयोग और उसकी बेहतरी के लिए मदद करने की संभावना पर भी विचार किया। 

उन्होंने कहा कि जब तक भावात्मक संवेदनशीलता को व्यापक नहीं किया जाएगा तब तक प्रकृति के साथ जीवन का समायोजन नहीं हो सकेगा। जब भारत में राष्ट्रीय सांस्कृतिक जागरण अपने चरम पर था, शुक्लजी ने पूर्व-पश्चिम की संस्कृतियों के संघर्ष का अपने ढंग से विश्लेषण किया। उनका मानना था कि जैसे-जैसे सभ्यता परिपक्व होती है, कवि की छिपी इच्छाओं को उजागर करने की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। 

बौद्धिक साहस के साथ शुक्लजी ने साहित्यिक आलोचना को नई शब्दावली और मानदंड से लैस करने का प्रयास किया। शुक्लजी की विरासत संपूर्ण मानवता को समाहित करते हुए आलोचना कार्य की सीमाओं का विस्तार करने और लोक मंगल को चर्चा के केंद्र में लाने में निहित है।

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