Artificial intelligence 2025-26: इक्कीसवीं सदी का चौथाई हिस्सा बीतने के साथ शुरू हो रहे नए साल 2026 के बारे में कहा जा सकता है कि अब यह तय होगा कि मानवता के भविष्य का क्या होगा. ऐसा कहने के पीछे जो धारणाएं काम कर रही हैं, उनका आधार यह है कि एआई के बेहद सक्रिय दौर के तीन साल पूरे होने के साथ-साथ तकनीक जिस दौर में पहुंच गई है, वहां इस तकनीक को लेकर आशंकाएं ज्यादा हैं और बेहतर भविष्य की उम्मीदें कम. एआई से संचालित भविष्य के जिस कगार पर दुनिया पहुंच गई है, वहां इस तकनीक से जुड़ी कंपनियां उम्मीदों और उज्ज्वल भविष्य का सपना दिखाती हैं.
लेकिन जिस तरह से वे एआई पर निर्भर हर व्यक्ति से जुड़े डेटा को भूखे शेर की तरह हड़प रही है, एआई तकनीकें (टूल्स) मानवीय बुद्धि का विकल्प बन रही हैं, उस उन्माद को देखकर यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि एआई को इसी तरह बढ़ने दिया गया तो इस तकनीक का अनियंत्रित विकास अंततः सभ्यता के लिए घातक साबित होगा.
औद्योगिकीकरण की शुरुआत के बाद मानव सभ्यता के ढाई सौ साल के सफर में मशीनों, तकनीकों और कारखानों के विकास के ज्यादातर दौर में विकास ने इंसानी हाथ के काम में ही हिस्सेदारी की है. भाप के इंजन और कताई की मशीनों से लेकर खेती के उपकरणों-यंत्रों ने एक तरह से हमारे काम में हाथ ही बंटाया है और श्रम की लागत को कम किया है.
लेकिन पहले कम्प्यूटर-इंटरनेट और फिर एआई के विकास ने इंसानी दिमाग को बेदखल करने का प्रयास किया है. इस बदलाव की व्याख्या करते समय इसे ध्यान में रखना चाहिए कि पृथ्वी पर इंसान अपनी दिमागी क्षमताओं के बल पर ही दूसरे जीवधारियों से आगे निकल सका है और उन पर अपनी बादशाहत कायम कर सका है.
ऐसे में यदि इंसानी मस्तिष्क एआई के आगे नत-मस्तक हो गया तो निश्चय ही कायनात पर हमारी पकड़ कमजोर होगी और जिस डरावने भविष्य का खाका खींचा जा रहा है, आशंका है कि वे बुरे सपने सच साबित हो सकते हैं. सवाल है कि आखिर वे चुनौतियां क्या हैं, जो एआई के जरिए सामने आ रही हैं और उनका सामना कैसे किया जा सकेगा.
एआई-जनित चुनौतियों का एक चित्र कुछ ही दिनों पहले तकनीक से जुड़ी पत्रिका- वायर्ड ने खींचा है. ‘वर्ष 2026 के लिए एआई की 6 भयावह भविष्यवाणियां’ शीर्षक से प्रकाशित इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि एआई तकनीक जिस उन्मादी गति से बढ़ रही है, वह सिर्फ रोजगार ही नहीं हड़पेगी, बल्कि कई स्तरों पर नई आपदाएं पैदा कर देगी.
आपदाओं की कई श्रेणियां हैं, लेकिन उन्हें मूलतः दो अस्तित्वगत खतरों के रूप में देखा जा सकता है. पहला है व्यक्तिगत गोपनीयता का क्षरण और दूसरा, विभिन्न देशों-महाद्वीपों के बीच अंतरराष्ट्रीय तनाव. एक मनुष्य की निजता या व्यक्तिगत गोपनीयता को पिछले दो-ढाई सौ साल के इतिहास में ज्यादा खतरा इसलिए नहीं था,
क्योंकि एनालॉग तकनीक के उस दौर में हर व्यक्ति की पहचान आम तौर पर तब तक सुरक्षित रहती थी, जब तक कि वह व्यक्ति खुद अपने विवरण और दस्तावेज दूसरों से साझा नहीं करता था. लेकिन पहले डिजिटल तकनीकों की विकास और फिर एआई का आक्रामण, तकनीक की तेज तरक्की ने ऐसे-ऐसे विकल्प पैदा कर दिए हैं कि दुनिया के दूसरे छोर पर बैठा व्यक्ति और एआई से लैस मशीनें (टूल्स) आपके बिना चाहे भी आपकी पहचान चोरी कर सकती हैं.
उनका इस्तेमाल दूसरों को ठगने सहित तमाम आपराधिक कृत्यों में कर सकती हैं. डीपफेक के जरिए आज अगर हजारों लोगों को ठगा जा रहा है, तो इसमें बड़ी भूमिका एआई तकनीकों की है, क्योंकि उनके इस्तेमाल से असली और नकली का फर्क मिट गया है.