पटनाः समाज में अक्सर यह धारणा रही है कि पिता की अंतिम यात्रा में अर्थी को कंधा बेटा ही देता है। लेकिन बिहार में वैशाली जिले से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जिसने समाज की पुरानी सोच को झकझोर कर रख दिया।. जिले के वैशाली थाना क्षेत्र स्थित नया टोला गांव में बेटा नहीं होने पर बेटियों ने पुत्र धर्म निभाते हुए पिता की अर्थी को कंधा दिया. पांच बेटियां पिता की अंतिम यात्रा में श्मशान गईं और पूरे रीति रिवाज से अंतिम संस्कार किया. परंपरा तोड़कर बेटियों ने मिसाल कायम करते हुए कहा कि ‘जब औरत भगवान राम को जन्म दे सकता है, तो पिता की अर्थी को कंधा क्यों नहीं दे सकती.’
गांव की गलियों से जब बेटियां अपने पिता की अर्थी को कंधा देकर श्मशान की ओर बढ़ीं तो माहौल गमगीन हो गया. लोगों की आंखों में आंसू थे, लेकिन उन आंसुओं में बेटियों के साहस और संस्कार के लिए सम्मान भी साफ झलक रहा था. माधुरी सिंह ने भावुक लहजे में कहा कि हम पांच बहनें हैं और हमारा कोई भाई नहीं है.
लोग अक्सर लड़कियों को कमजोर समझते हैं और मानते हैं कि सिर्फ बेटा ही परिवार का सहारा होता है. लेकिन हमने पिता को कंधा देकर यह साबित किया है कि बेटियां किसी से कम नहीं होती. उन्होंने कहा कि जिस औरत की कोख से भगवान राम जन्म ले सकते हैं, वही बेटी अपने पिता को अंतिम विदाई क्यों नहीं दे सकती?
हमारे पिताजी ने हमें पढ़ाया-लिखाया, अच्छे संस्कार दिए और हर जिम्मेदारी निभाई. आज उनका आखिरी फर्ज निभाना हमारा कर्तव्य था. माधुरी की बातें सुन वहां मौजूद कई लोगों की आंखें भर आईं. गांव के बुजुर्गों ने भी माना कि यह दृश्य समाज के लिए एक बड़ा संदेश है. बेटियों ने सिर्फ अपने पिता को कंधा नहीं दिया, बल्कि उस सोच को भी चुनौती दी जो सदियों से बेटे और बेटी में फर्क करती आई है.
घटना अब पूरे इलाके में चर्चा का विषय बनी हुई है. दरअसल, नया टोला निवासी तारिणी प्रसाद सिंह का निधन हो गया. उनके परिवार में पत्नी ललिता देवी और पांच बेटियां हैं, लेकिन कोई पुत्र नहीं है. ऐसे में अंतिम संस्कार को लेकर परिवार में असमंजस की स्थिति थी. लेकिन परिवार की पांचों बेटियों पूनम सिंह, नीलम सिंह, माधुरी, माला और चांदनी ने आगे आकर अपने पिता की अर्थी को कंधा दिया और पूरे रीति-रिवाज के साथ अंतिम संस्कार संपन्न कराया.