यह बात सही है कि भारत के चुनावों में बाहुबल एवं धनबल का प्रभाव रहा है. 1980-90 के दशक के चुनाव बाहुबलियों एवं धनबलियों के प्रभाव से इतने डरावने हो गए थे कि सज्जन लोग चुनाव लड़ने तक से डरने लगे थे. हालांकि आज का सच वह नहीं है. 1993 के बाद से चुनाव आयो ...
हमें समझना होगा कि लोगों की भावनाओं को भड़काने से कुछ हासिल होने वाला नहीं है. बल्कि इस चक्कर में विकास के मुद्दे हाशिये पर चले जाते हैं. लोगों को सतत भय के माहौल में रखना और उनकी भावनाएं भड़काना हम वहन नहीं कर सकते. ...
एक बात याद रखी जानी चाहिए कि धर्म और आपद्धर्म दो व्यवस्थाएं हैं जिनसे भारतीय जन अपने भूत और भविष्य से रिश्ते जोड़ता है. जब धर्म में उसे आडंबर दिखने लगता है तो वह उससे विमुख होने लगता है. जहां उसे कट्टरता दिखने लगती है, वह उससे किनारा करने लगता है. भा ...
सीतारमण से जब पूछा गया कि क्या इतना लंबा भाषण देना जरूरी था, तो उन्होंने कहा कि इसकी जरूरत थी। उन्होंने यहां संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा, ''इसकी आवश्यकता थी। निश्चित रूप से इसकी जरूरत थी। मैंने पानी पीने के बाद बचे हुए हिस्से को पूरा कि ...
फर्ज कीजिए देश चलाने का ठेका अमेजन को दे दिया जाए तो लफड़ा ही खत्म हो जाएगा. अमेजन चाहेगी कि कराची के मसाले और आगरा का पेठा बिना झमेले के इधर-उधर जाएं. पब्लिक को हर दो-चार महीने में लुभावने ऑफर मिलेंगे. अमेजन के पास पैसे की कमी नहीं तो क्या पता कभी ...
हमें 1969 में बैंकों के राष्ट्रीयकरण के निर्णय पर पुन: विचार करना चाहिए. उस समय उद्देश्य था कि बैंकों द्वारा छोटे उद्योगों और ग्रामीण क्षेत्नों में सेवाएं उपलब्ध कराई जाए. प्रश्न यह है कि इस कार्य को रिजर्व बैंक द्वारा निजी बैंकों से क्यों नहीं कराया ...
यदि कुल बजट में बच्चों की हिस्सेदारी को आधार बनाया जाए तो वर्ष 2012-13 में बच्चों के लिए कुल बजट का 5.04 प्रतिशत आवंटित किया गया था, जो मौजूदा वर्ष में घटकर 3.29 प्रतिशत पर पहुंच गया है. वर्ष-दर-वर्ष बच्चों के लिए प्रस्तावित खर्च में कटौती आई है. ...