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Solar Mission: आदित्य एल-1 ने पृथ्वी की तीसरी कक्षा को सफलतापूर्वक की पार, जानें अभी कितनी बार पार करना होगा अर्थ-बाउंड फायर

By अंजली चौहान | Updated: September 10, 2023 07:30 IST

भारत के सौर मिशन के प्रमुख उद्देश्यों में सौर कोरोना की भौतिकी और इसके ताप तंत्र, सौर वायु त्वरण, सौर वायुमंडल की युग्मन और गतिशीलता, सौर वायु वितरण और तापमान अनिसोट्रॉपी, और कोरोनल मास इजेक्शन (सीएमई) की उत्पत्ति का अध्ययन शामिल है।

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Solar Mission: भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) का पहला सौर मिशन आदित्य एल 1 ने पृथ्वी की ओर जाने वाली तीसरी कक्षा को सफलतापूर्वक पार कर लिया है। इसरो ने ट्वीट के जरिए इसकी जानकारी दी है।

इसरो ने बताया कि नई कक्षा 296 किमी x 71767 किमी है। पृथ्वी के चारों ओर आदित्य एल 1 की परिक्रमा कक्षा संचालन किए जाएंगे जिनमें से तीन दिन में वह सफलतापूर्वक इसे पूरा करेगा।

एक्स पर एक पोस्ट में इसरो ने लिखा, “तीसरा पृथ्वी-बाध्य युद्धाभ्यास (ईबीएन # 3) ISTRAC, बेंगलुरु से सफलतापूर्वक किया गया है। इस ऑपरेशन के दौरान मॉरीशस, बेंगलुरु, एसडीएससी-शार और पोर्ट ब्लेयर में इसरो के ग्राउंड स्टेशनों ने उपग्रह को ट्रैक किया। प्राप्त की गई नई कक्षा 296 किमी x 71767 किमी है। अगला युद्धाभ्यास (ईबीएन#4) 15 सितंबर, 2023 को लगभग 02:00 बजे के लिए निर्धारित है।"

गौरतलब है कि इसरो के मिशन आदित्य एल 1 ने 5 सितंबर को पृथ्वी की कक्षा का दूसरा पड़ाव पूरा किया था जिसमें 282 किमी x 40225 किमी की कक्षा प्राप्त की गई थी।

वहीं, इससे पहले पहली कक्षा को 3 सितंबर को पार किया गया था। इसरो का मिशन सूर्य एक महत्वकांक्षी मिशन है जिसे सफलतापूर्वक पार करने के बाद इसरो को एक और कामयाबी मिल जाएगी।

दरअसल, एक कक्षीय पैंतरेबाजी जिसे बर्न भी कहा जाता है। एक अंतरिक्ष उड़ान के दौरान एक नियमित प्रोटोकॉल है। इस अभ्यास के दौरान प्रणोदन प्रणाली का उपयोग करके आदित्य एल 1 की कक्षा को बढ़ाया जाता है।

इस प्रक्रिया में रॉकेट दागना और कोणों का समायोजन भी शामिल होगा। यह समझने के लिए आप झूले का उदाहरण देखे, जैसे जब झूला जमीन की ओर नीचे आ रहा हो तो उस पर दबाव डाला जाता है। इसी प्रकार, एक बार जब आदित्य L1 पर्याप्त वेग प्राप्त कर लेगा, तो यह L1 की ओर अपने इच्छित पथ पर घूमेगा।

सूर्य के रहस्यों का पता लगाएगा आदित्य एल 1

आदित्य एल 1 सूर्य के रहस्यों का पता लगाएगा। यह सूर्य का विस्तृत अध्ययन करने के लिए सात अलग-अलग पेलोड ले गया, जिनमें से चार सूर्य से प्रकाश का निरीक्षण करेंगे और अन्य तीन प्लाज्मा और चुंबकीय क्षेत्र के इन-सीटू मापदंडों को मापेंगे।

आदित्य-एल1 को लैग्रेंजियन प्वाइंट 1 (या एल1) के चारों ओर एक प्रभामंडल कक्षा में स्थापित किया जाएगा, जो सूर्य की दिशा में पृथ्वी से 1.5 मिलियन किमी दूर है। चार महीने के समय में यह दूरी तय करने की उम्मीद है।

यह पृथ्वी से लगभग 1.5 मिलियन किमी दूर, सूर्य की ओर निर्देशित रहेगा, जो पृथ्वी-सूर्य की दूरी का लगभग 1 प्रतिशत है। सूर्य गैस का एक विशाल गोला है और आदित्य-एल1 सूर्य के बाहरी वातावरण का अध्ययन करेगा। इसरो ने कहा कि आदित्य-एल1 न तो सूर्य पर उतरेगा और न ही सूर्य के करीब आएगा।

यह रणनीतिक स्थान आदित्य-एल1 को ग्रहण या गुप्त घटना से बाधित हुए बिना लगातार सूर्य का निरीक्षण करने में सक्षम बनाएगा, जिससे वैज्ञानिकों को वास्तविक समय में सौर गतिविधियों और अंतरिक्ष मौसम पर उनके प्रभाव का अध्ययन करने की अनुमति मिलेगी।

इसके अलावा, अंतरिक्ष यान का डेटा उन प्रक्रियाओं के अनुक्रम की पहचान करने में मदद करेगा जो सौर विस्फोट की घटनाओं को जन्म देती हैं और अंतरिक्ष मौसम चालकों की गहरी समझ में योगदान देती हैं।

टॅग्स :आदित्य-एल1सूर्यभारतइसरो
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