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ईमानदारी के अभाव में शातिर बन जाती है समझदारी

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: May 20, 2026 07:14 IST

आज के शासकों के भीतर भी जनता वही ईमानदारी देखना चाहती है और जहां वह दिख जाती है वहां अपनी जान तक न्यौछावर करने को तैयार रहती है.

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हेमधर शर्मा

पश्चिम एशिया में जारी वैश्विक संकट के मद्देनजर, हाल ही में प्रधानमंत्री द्वारा मितव्ययिता की अपील के बाद किफायतशारी दिखाने की होड़ लग गई है. मुख्यमंत्रियों से लेकर राज्यपालों तक ने अपने काफिले में वाहन आधे कर दिए हैं. अधिकारियों को कार की बजाय मेट्रो-बस से यात्रा करने और होटलों की बजाय वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये बैठकें करने का आदेश जारी कर दिया गया है. नेताओं से विमान यात्रा टालने को कहा गया है (यह बात और है कि साइकिल या मोटरसाइकिल पर बैठकर फोटो खिंचाने वाले कुछ नेताओं के पीछे वाहनों का लम्बा काफिला नजर आता है).

फिजूलखर्ची करने वालों द्वारा प्रधानमंत्री की अपील के बाद पैसे बचाने की मची होड़ को देखकर अचरज होता है कि जिन चीजों के बिना भी काम चल सकता था, आखिर अब तक चलाया क्यों नहीं जा रहा था! नेता अगर वाहनों का काफिला अपनी सुरक्षा के लिए लेकर चलते थे तो वह मुद्दा तो अभी भी बरकरार है, लेकिन काफिले में कटौती के बावजूद कहीं भी तो किसी नेता की जान कोई नहीं ले रहा!

आपदाओं या संकटों की एक अच्छी बात यह होती है कि वे हमारे सुविधाभोगी जीवन को झकझोरते हुए, आत्ममंथन के लिए प्रेरित करते हैं. कोरोना महामारी के दौरान यह सच है कि मानव जाति ने बहुत दिक्कतें झेलीं, लेकिन यह भी सच है कि उसी वजह से प्रकृति में अपूर्व निखार आ गया था. चंद दिनों के लिए ही सही, हम मनुष्यों के अपने घरों में कैद होने से सारा मनुष्येतर जगत उल्लास से भर गया था, मानो मानव जाति के ‘पिंजरे’ में बंद होने की खुशियां मना रहा हो! बहरहाल, यह तो तय है कि कथित विकास से हम मनुष्यों को छोड़कर किसी को भी फायदा नहीं हो रहा(और दीर्घावधि की दृष्टि से हमारे लिए भी यह नुकसानदायक ही है).

शायद इसीलिए आपदाएं या संकट चेतावनी देने के लिए आते हैं कि हम सुधर जाएं. कुछ हद तक हम (मजबूरी में ही सही) सुधरते भी हैं, जैसा कि वर्तमान वैश्विक तेल संकट के दौरान देखने में आ रहा है. लेकिन दुर्भाग्यवश, संकट टलते ही हम फिर से पहले की तरह उच्छृंखल हो जाते हैं. तो क्या हम मनुष्य अभी तक आजादी या स्वानुशासन में रहने के योग्य ही नहीं बन पाए हैं!

यह सच है कि हम अगर अनुशासित रहना सीख जाएं तो बाहर के किसी अंकुश की जरूरत ही न पड़े. ऐसे समाज में शासक अगर रहेंगे भी तो वे सिर्फ नैतिक बल पर शासन करेंगे, दंड के भय की कहीं कोई जरूरत ही नहीं पड़ेगी. लेकिन शायद यह भी सच है कि ऐसे आदर्श समाज की हम सिर्फ कल्पना ही कर सकते हैं, उसे हकीकत बना पाना अगर असम्भव नहीं तो बेहद मुश्किल जरूर है.

शायद इसीलिए हर युग में हम कुछ ऐसे नायक गढ़ते रहे हैं, जिनके गुणों का बाकी लोग अनुकरण कर सकें. आज भी नेताओं-अभिनेताओं के पीछे अगर भीड़ जुटती है तो इसीलिए कि वह उन्हें अपने आदर्श के रूप में देखना चाहती है. लेकिन अपनी स्वार्थपूर्ति में ही लगे रहने वाले नेता-अभिनेता क्या जनता की इस उम्मीद पर खरे उतर पाते हैं?

आजादी के आंदोलन के दौरान, जब हम परतंत्र थे तो महात्मा गांधी के पास कोई शासन-शक्ति नहीं होेने के बावजूद, करोड़ों लोग उनकी एक आवाज पर सिर्फ इसलिए उठ खड़े होते थे क्योंकि उन्हें भरोसा रहता था कि यह आदमी उन्हें दगा नहीं दे सकता, इसके भीतर कोई पाखंड नहीं है कि कहे कुछ और मन में कुछ और रखे. आज के शासकों के भीतर भी जनता वही ईमानदारी देखना चाहती है और जहां वह दिख जाती है वहां अपनी जान तक न्यौछावर करने को तैयार रहती है.

1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के समय देश में अनाज की भारी कमी हो गई थी. तब तत्कालीन प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने लोगों से हफ्ते में एक दिन (सोमवार की शाम) एक वक्त का उपवास रखने की अपील की थी ताकि देश अन्न के मामले में आत्मनिर्भर बन सके. लेकिन इसके पहले उन्होंने अपने पूरे परिवार को एक दिन भूखा रखकर यह परखा कि उनके बच्चे इस स्थिति का सामना कैसे करते हैं.

जब उन्हें विश्वास हो गया कि उनका परिवार इसे सह सकता है, तब उन्होंने राष्ट्र के सामने यह आह्वान किया. उनकी इस ईमानदारी का ही असर था कि उस समय देश के करोड़ों लोगों ने स्वेच्छा से सप्ताह में एक वक्त का भोजन छोड़ दिया था.  

इसमें कोई शक नहीं कि नेता अगर मितव्ययिता की मिसाल बनकर दिखाएं तो जनता भी ऐसा करने को खुशी-खुशी तैयार हो जाएगी, लेकिन चुनावों के दौरान जब वह अंधाधुंध फिजूलखर्ची देखती है तो संशय में पड़ जाती है कि कहीं उसका ‘इस्तेमाल’ करने की कोशिश तो नहीं की जा रही है?

हकीकत यह है कि दुनिया को आज समझदारों की उतनी जरूरत नहीं, जितनी ईमानदारों की है. अगर आपके भीतर ईमानदारी नहीं है तो आपकी समझदारी वरदान की बजाय अभिशाप बन जाती है. और समझदारी भले ही ईश्वरप्रदत्त गुण हो, ईमानदार तो हर कोई बन सकता है! फिर हमारे नेता इतना सा भी काम क्यों नहीं कर पाते और अपनी ईमानदारीविहीन समझदारी से शातिर बनते चले जाते हैं!

टॅग्स :नरेंद्र मोदीईरानभारत
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