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बच्चों को वीडियो गेम, मोबाइल और कम्प्यूटर के बजाय सार्वजनिक पुस्तकालय का परिवेश दिया जाना चाहिए: ओम थानवी

By भाषा | Updated: June 3, 2019 17:07 IST

थानवी ने सोमवार को यहां कहा कि अच्छे साहित्य से अच्छी भाषा आती है। उन्होंने कहा कि लोक कथाएं जितनी बड़ों के लिए महत्वपूर्ण हैं उतनी ही बच्चों के लिए उपयोगी हैं। इनमें साम्प्रदायिक और धार्मिक नहीं बल्कि उदात्त चरित्र का कलेवर होता है। बच्चों को बजाय वीडियो गेम्स, मोबाइल और कम्प्यूटर के सार्वजनिक पुस्तकालय का परिवेश दिया जाना चाहिए ताकि उनकी अनुभूति और अनुभव उपलब्धियों से भरी हो।

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ठळक मुद्देराजस्थान हिन्दी ग्रन्थ अकादमी जयपुर के निदेशक डॉ. बी. एल. सैनी ने कहा कि बाल्यकाल से ही बच्चों के जीवन निर्माण को महत्व दिया जाना चाहिए। हरिदेव जोशी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति ओम थानवी ने कहा कि अच्छे साहित्य से अच्छी भाषा आती है।

जाने माने पत्रकार और हरिदेव जोशी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति ओम थानवी ने कहा है कि बच्चों को विडियो गेम, मोबाइल और कम्प्यूटर के बजाय सार्वजनिक पुस्तकालय का परिवेश दिया जाना चाहिए ताकि उनकी अनुभूति और अनुभव उपलब्धियों से भरी हो।

राष्ट्रीय पुस्तक न्यास और राजस्थान हिन्दी ग्रन्थ अकादमी के तत्वावधान में आयोजित ‘समकालीन भारतीय बाल साहित्यः नवीन आयाम’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी को सम्बोधित करते हुए थानवी ने सोमवार को यहां कहा कि अच्छे साहित्य से अच्छी भाषा आती है।

उन्होंने कहा कि लोक कथाएं जितनी बड़ों के लिए महत्वपूर्ण हैं उतनी ही बच्चों के लिए उपयोगी हैं। इनमें साम्प्रदायिक और धार्मिक नहीं बल्कि उदात्त चरित्र का कलेवर होता है। बच्चों को बजाय वीडियो गेम्स, मोबाइल और कम्प्यूटर के सार्वजनिक पुस्तकालय का परिवेश दिया जाना चाहिए ताकि उनकी अनुभूति और अनुभव उपलब्धियों से भरी हो।

उन्होंने कहा कि विजयदान देथा की लोक कथाएं लोकजीवन का आईना रही हैं, जिन्हें बाल साहित्य का हिस्सा बनाना चाहिए। अच्छा साहित्य संस्कारों का निर्माण करता है जिससे व्यक्तित्व बनता है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज बड़े साहित्यकार बच्चों के लिए साहित्य नहीं लिख रहे और बडे सम्पादक बाल साहित्य के लिए पर्याप्त स्पेस (स्थान) नहीं देते।

उन्होंने कहा कि प्रेमचंद, हजारी प्रसाद द्विवेदी, अज्ञेय आदि बड़े साहित्यकारों ने बच्चों के भविष्य निर्माण को तरजीह देते हुए उनके लिए साहित्य रचा। इस परम्परा को आगे बढ़ाने की जरूरत है। अंधेरे में टिमटिमाती लौ भी नजर आती है तो बड़ी उपलब्धि हासिल होगी।

संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए राजस्थान हिन्दी ग्रन्थ अकादमी जयपुर के निदेशक डॉ. बी. एल. सैनी ने कहा कि बाल्यकाल से ही बच्चों के जीवन निर्माण को महत्व दिया जाना चाहिए। उन्हें अच्छे साहित्य से रूबरू कराया जाना जरूरी है।

हमारा प्रयास रहे कि राजकीय या निजी विद्यालयों के सभी विद्यार्थियों तक उच्च कोटि का बाल साहित्य सहज सुलभ हो। संगोष्ठी में कई नामी गिरामी साहित्कार मौजूद थे। इससे पूर्व राष्ट्रीय पुस्तक न्यास (एनबीटी) के सम्पादक मानस रंजन महापात्र और संगोष्ठी के संयोजक द्विजेन्द्र कुमार ने संगोष्ठी के उददेश्यों पर प्रकाश डाला। मंगलवार को भी संगोष्ठी में तीन सत्र होंगे। 

टॅग्स :ओम थानवीराजस्थानप्रेमचंद
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