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सेना और न्यायपालिका के कुचक्र में शरीफ

By लोकमत समाचार हिंदी ब्यूरो | Updated: July 14, 2018 12:53 IST

पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के राजनीतिक करियर को जिस तरह से न्यायपालिका खत्म कर रही है उससे यह कहा जा सकता है कि सेना नवाज को किसी भी कीमत पर सत्ता में फिर से देखना नहीं चाहती है।

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लेखक-रहीस सिंह  मोहम्मद अली जिन्ना ने पाकिस्तान की बुनियाद फरेब, कुटिलता और धर्म के गठजोड़ पर रखी थी जिसमें ताकत का बेजा इस्तेमाल भी शामिल था। पाकिस्तान अभी भी उसी र्ढे पर चल रहा है। यह अलग बात है कि पूरी ताकत सेना के हाथ में चली गई और धर्म कट्टरपंथी जमातों के हाथ में, बचा सिर्फ फरेब और कुटिलता जो राजनेताओं के हिस्से में है। यही वजह है कि पाकिस्तान में लोकतंत्र निरंतर इम्तेहान से गुजरता रहा और कई बार सेना के बूटों के नीचे रौंदा भी गया। खास बात यह रही कि पाकिस्तान की न्यायपालिका इस मामले में सेना के पाले में दिखी और संविधान व लोकतंत्र को सेना की चेरी बनाने में अहम भूमिका निभाती रही। 

अब एक बार फिर नवाज शरीफ को केंद्र में रखकर लोकतंत्र जमींदोज करने की कुटिल चालें चली जा रही हैं। चाल चलने वाली तो सेना ही है लेकिन न्यायपालिका ने उसका वजीर बनना स्वीकार कर रखा है। यही वजह है कि अब पाकिस्तान के लोग भी इस बात को लेकर संशय में हैं कि पाकिस्तान में जम्हूरियत बचेगी या नहीं। पाकिस्तान में ‘डीप स्टेट’ यानी सेना और खुफिया एजेंसी आईएसआई मिलकर अब कौन सा ‘गेम’ खेलेंगी। संशय तो इस बात को लेकर भी है कि सरकार बनाएगा कौन और चलाएगा कौन? क्या ये दोनों एक ही होंगे या फिर अलग-अलग? दुनिया इसे माने या न माने लेकिन सच यही है कि पाकिस्तान की सेना और खुफिया एजेंसी आईएसआई नवाज को सलाखों के पीछे धकेलकर किसी प्यादे को इस्लामाबाद में प्रतिष्ठित करना चाहती है ताकि रावलपिंडी से शासन आसानी से चलाया जा सके। इमरान खान जैसे कच्चे और अनिश्चित खिलाड़ी इसे देखते हुए इस निष्कर्ष पर पहुंच रहे हैं कि वे ही डीप स्टेट के असली सिपहसालार (सही अर्थो में प्यादे) हैं।

पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के राजनीतिक करियर को जिस तरह से न्यायपालिका खत्म कर रही है उससे यह कहा जा सकता है कि सेना नवाज को किसी भी कीमत पर सत्ता में फिर से देखना नहीं चाहती है।  ऐसी स्थिति में न्यायपालिका वही करेगी जो सेना की मंशा होगी। अगर ऐसा न होता तो जो मामला (पनामा गेट केस) खारिज हो चुका था, उसे सुप्रीम कोर्ट क्यों रि-ओपन करता। दूसरा, मामले का निपटारा किए बिना ही कोर्ट नवाज शरीफ को न केवल प्रधानमंत्री के पद के अयोग्य बल्कि पार्टी अध्यक्ष पद के लिए भी अयोग्य करार नहीं देता। यह दुनिया में शायद एक अजीबोगरीब मामला होगा जहां मामले की सुनवाई बाद में होती है और सजा पहले मुकर्रर कर दी गई। नवाज को सींखचों के पीछे भेजने का षडयंत्र लोकतंत्र को खत्म करने की साजिश जैसा दिख रहा है और यह काम इस समय सेना और पाकिस्तान की न्यायपालिका मिलकर कर रहे हैं।

टॅग्स :नवाज शरीफ
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