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Mahavir Jayanti 2026: युद्धग्रस्त विश्व में अहिंसा ही है एकमात्र राह

By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: March 31, 2026 05:24 IST

Mahavir Jayanti 2026: विचारों को गहराई से समझें, तो यह स्पष्ट होता है कि युद्ध की जड़ें बाहरी परिस्थितियों में नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर उत्पन्न होने वाले राग, द्वेष, अहंकार और लालच में निहित हैं.

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ठळक मुद्देMahavir Jayanti 2026: तीर्थंकर भगवान महावीर के अहिंसा के सिद्धांत की प्रासंगिकता अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है.Mahavir Jayanti 2026: आज के समय में हिंसा केवल युद्ध के मैदान तक सीमित नहीं है.Mahavir Jayanti 2026: प्रभु महावीर का अहिंसा का सिद्धांत आज के युद्धग्रस्त विश्व के लिए एक नैतिक दिशा प्रदान करता है.

श्रमण डॉ. पुष्पेन्द्र

आज का विश्व एक विचित्र विरोधाभास से गुजर रहा है. एक ओर विज्ञान, तकनीक और वैश्वीकरण ने मानव जीवन को अभूतपूर्व सुविधाएं दी हैं, वहीं दूसरी ओर युद्ध, हिंसा और असहिष्णुता ने मानवता के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है. वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में यह स्पष्ट दिखाई देता है कि हिंसा कभी भी स्थायी समाधान नहीं दे सकती.

युद्ध भले ही किसी समस्या का तात्कालिक समाधान प्रतीत हो, लेकिन वह दीर्घकाल में और अधिक संघर्षों को जन्म देता है. आज आवश्यकता है एक ऐसे दृष्टिकोण की, जो केवल शक्ति और प्रभुत्व पर नहीं, बल्कि संवेदना, सह-अस्तित्व और नैतिकता पर आधारित हो. यहीं पर तीर्थंकर भगवान महावीर के अहिंसा के सिद्धांत की प्रासंगिकता अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है.

भगवान महावीर ने अहिंसा को केवल शारीरिक हिंसा तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे विचार, वचन और कर्म- तीनों स्तरों पर लागू किया. उनके अनुसार किसी भी प्राणी को पीड़ा पहुंचाना हिंसा है, चाहे वह प्रत्यक्ष हो या अप्रत्यक्ष. प्रभु महावीर का अहिंसा का सिद्धांत आज के युद्धग्रस्त विश्व के लिए एक नैतिक दिशा प्रदान करता है.

यदि हम उनके विचारों को गहराई से समझें, तो यह स्पष्ट होता है कि युद्ध की जड़ें बाहरी परिस्थितियों में नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर उत्पन्न होने वाले राग, द्वेष, अहंकार और लालच में निहित हैं. जब तक इन मानसिक प्रवृत्तियों पर नियंत्रण नहीं किया जाएगा, तब तक बाहरी शांति स्थापित नहीं हो सकती. आज के समय में हिंसा केवल युद्ध के मैदान तक सीमित नहीं है.

यह हमारे दैनिक जीवन में भी विभिन्न रूपों में उपस्थित है- विचारों की कट्टरता, शब्दों की कठोरता, सामाजिक विभाजन और डिजिटल माध्यमों पर फैलती नफरत के रूप में. महावीर का संदेश हमें यह सिखाता है कि वास्तविक अहिंसा का पालन तभी संभव है, जब हम अपने भीतर की नकारात्मकता को पहचानकर उसे नियंत्रित करें. विशेष रूप से वर्तमान अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में, जहां राष्ट्रों के बीच अविश्वास और प्रतिस्पर्धा बढ़ती जा रही है, ऐसे वक्त पर तीर्थंकर महावीर का ‘जियो और जीने दो’ का सिद्धांत अत्यंत प्रासंगिक है.

यह सिद्धांत केवल व्यक्तिगत जीवन के लिए ही नहीं, बल्कि वैश्विक नीतियों के लिए भी मार्गदर्शक बन सकता है. यदि राष्ट्र एक-दूसरे के अस्तित्व, संप्रभुता और हितों का सम्मान करें तो संघर्ष की संभावनाएं स्वतः कम हो सकती हैं.

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