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राजेश बादल का ब्लॉग: कांग्रेस के दिग्गज और कमलनाथ की नाकामी

By राजेश बादल | Updated: March 21, 2020 06:50 IST

यह सच है कि भाजपा के करीब आधा दर्जन असंतुष्ट विधायक कमलनाथ के सीधे संपर्क में थे. लेकिन अन्य दबावों के चलते कमलनाथ इन विधायकों से भरोसेमंद संवाद नहीं कर पाए. खबरें तो यही हैं कि लेनदेन पर बात अटक गई. इसके अलावा कांग्रेस के एक प्रादेशिक महारथी ने भाजपा के खेमे में इन विधायकों के नाम पहुंचा दिए.

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कमलनाथ की कांग्रेस सरकार मध्य प्रदेश से विदा हो गई. विदाई तो कमोबेश पहले ही तय थी. कमलनाथ ही आखिरी समय तक किला लड़ाते रहे. अगर उनकी सरकार बच जाती तो शायद चमत्कार ही होता.  वैसे कमलनाथ के आत्मविश्वास के तीन बड़े कारण थे. तीन में से एक भी उनके पक्ष में हो जाता तो पांसा उल्टा पड़ जाता.

गुरुवार की शाम सुप्रीम कोर्ट ने जब 20 मार्च की शाम पांच बजे तक फ्लोर टेस्ट का निर्देश दिया तो एक तरह से कमलनाथ अपनी बची-खुची जंग भी हार गए. कमलनाथ उम्मीद कर रहे थे कि सर्वोच्च न्यायालय बहुमत सिद्ध करने के लिए कम से कम दो सप्ताह का समय तो देगा. पर ऐसा नहीं हुआ.

कमलनाथ के इस भरोसे का ठोस आधार था. तीन साल पहले मणिपुर में जब कांग्रेस के विधायकों ने पार्टी छोड़ी तो सुप्रीम कोर्ट ने बहुमत सिद्ध करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया था. कांग्रेस के टी. श्यामकुमार 2017 में जीते और बाद में बीजेपी में जाकर मंत्नी बन गए. उनके साथ आठ विधायक भी भाजपा में गए थे.  इसी मामले में मणिपुर विधानसभा अध्यक्ष को चार सप्ताह का वक्त दिया गया था.

इसके बाद कर्नाटक के मामले में भी ऐसा ही हुआ. पंद्रह विधायकों ने अपने त्यागपत्न सीधे अध्यक्ष को सौंपे थे. स्पीकर ने फैसले में देरी की. नतीजतन विधायक सुप्रीम कोर्ट में गए. सर्वोच्च अदालत ने व्यवस्था दी कि विधानसभा अध्यक्ष अपने स्तर पर इस्तीफों के बारे में निर्णय लेने के लिए आजाद हैं. अदालत इसमें समय सीमा तय नहीं कर सकती. इसी आधार पर कमलनाथ को लग रहा था कि सुप्रीम कोर्ट उन्हें दो-तीन हफ्ते तो देगा ही, साथ ही स्पीकर की सदन के भीतर की सर्वोच्चता बरकरार रखेगा. लेकिन यह निर्णय भी उल्टा हुआ और कमलनाथ टूट गए.

वैसे दो अन्य कारणों में एक तो बागी 22 विधायकों से कोई संवाद नहीं हो पाना था. उनमें छह मंत्नी थे. बीजेपी के किले में कोई कांग्रेसी परिंदा पर नहीं मार पाया. जानकार मानते हैं कि अगर मुख्यमंत्नी के तौर पर कमलनाथ स्वयं बेंगलुरु जाते तो संभवतया अलग दृश्य होता. तीसरा और अंतिम कारण कमलनाथ की गुप्त योजना का उजागर हो जाना रहा.

यह सच है कि भाजपा के करीब आधा दर्जन असंतुष्ट विधायक कमलनाथ के सीधे संपर्क में थे. लेकिन अन्य दबावों के चलते कमलनाथ इन विधायकों से भरोसेमंद संवाद नहीं कर पाए. खबरें तो यही हैं कि लेनदेन पर बात अटक गई. इसके अलावा कांग्रेस के एक प्रादेशिक महारथी ने भाजपा के खेमे में इन विधायकों के नाम पहुंचा दिए.  

मध्य प्रदेश अब एक बार फिर उपचुनावों की दहलीज पर है. इस्तीफा दे चुके 22 विधायकों और 2 पहले से रिक्त स्थानों पर चुनाव होंगे. कांग्रेस आलाकमान और कमलनाथ की टीम के लिए ये चुनाव अग्निपरीक्षा से कम नहीं होंगे. कांग्रेस अपने भितरघाती नेताओं से उबर सकेगी-फिलहाल नहीं लगता.

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