भाजपा आज राजनीतिक तौर पर बेहद मजबूत स्थिति में है पर ये भी सच है कि पार्टी ने अपने सत्ता-सफर में राजनीतिक दोस्त भी गंवाए हैं. ऐसे में संभवत: 2024 की राह उसके लिए उतनी आसान नहीं रहने वाली है.
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बीते दिनों एक कार्यक्रम में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा था कि मैं भी मध्यम वर्ग से ताल्लुक रखती हूं इसलिए मैं मध्यम वर्ग के दबाव को समझ सकती हूं। पिछले वर्ष 2022-23 के बजट में इस वर्ग को कोई बड़ी राहत नहीं मिली थी और अब महामारी के कारण दो साल
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आज यदि शिक्षा के प्रति संशय और अन्यमनस्कता है तो इसका एक बड़ा कारण शिक्षा की विषयवस्तु और प्रक्रिया की दुर्बलता और देश के संदर्भ से उसका कटा होना भी है.
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करीब 62 साल पहले जवाहरलाल नेहरू और अयूब खान के प्रयत्नों से सिंधु नदी के पानी को लेकर दोनों देशों के बीच सिंधु जल संधि हुई थी, जिसका पालन कई युद्धों के दौरान भी होता रहा. लेकिन भारत ने अब संधि के नियमों का हवाला देते हुए इसके प्रावधानों को बदलने की प
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न कोई मंच, न अतिथि, न माला या स्वागत- गांव के किसी मंदिर में, कस्बे के किसी चबूतरे पर या किसी के घर के आंगन में या फिर खुले मैदान में- कभी बीस तो कभी 200, कभी उससे भी ज्यादा लोग एकत्र होते हैं. रघुपति राघव राजाराम- के गान से सभा शुरू होती है और फिर व
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पुरानी घटनाओं से हमें सबक जरूर लेना चाहिए लेकिन यह भी ध्यान रहे कि नफरत के पुराने जख्मों को हम जितना कुरेदेंगे तकलीफ उतनी ही ज्यादा होगी। इस वक्त जरूरत प्रगति की राह पर और तेजी से बढ़ने की है, न कि किसी बवाल में उलझकर स्वयं को पीथे धकेलने के हालात पै
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आमतौर पर इस तरह के बहुराष्ट्रीय मंचों में सभी सदस्य देशों को अध्यक्ष देश द्वारा बैठक के लिए आमंत्रित किए जाने की परंपरा है, लेकिन जिस तरह से पड़ोसी देशों चीन और पाकिस्तान के साथ तल्ख रिश्तों का दौर चल रहा है, इस निमंत्रण को शांति कायम करने की भारत की
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समाजवादियों को लग रहा है कि यह मुलायमजी का सम्मान नहीं, उप्र के यादव वोटों को हासिल करने की कोशिश है। अखिलेश के लिए भाजपा ने यह बड़ी दुविधा पैदा कर दी है।
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जापान इस समय रक्षा और कूटनीति की दृष्टि से जो कदम उठा रहा है क्या वे वास्तव में चीन की रक्षा दीवार को दरकाने की क्षमता रखते हैं? क्या यह भारत-जापान के बीच परंपरागत मैत्री भर है अथवा इससे बहुत आगे की बात? निष्कर्ष की ओर प्रस्थान से पहले तीन बिंदुओं पर
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गणतंत्र दिवस के इस बारे के परेड में सिर्फ ‘मेड इन इंडिया’ यानी स्वदेशी हथियारों का प्रदर्शन किया गया। भारत में बनी 105 एमएम इंडियन फील्ड गन से 21 तोपों की सलामी दी गई। किसी भी रूसी टैंक को नहीं शामिल किया गया।
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