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विवेक शुक्ला का ब्लॉग: आखिर कहां गुम हो जाते हैं बालवीर पुरस्कार विजेता?

By विवेक शुक्ला | Updated: January 26, 2023 14:50 IST

अगले दिन अस्पताल में उनका हालचाल जानने के लिए बाबू जगजीवन राम स्वयं आए। अब पहला बाल वीर वृद्ध हो चुका है। वे लगभग 78 साल के हो गए हैं।

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ठळक मुद्देगणतंत्र दिवस से कुछ दिन पहले तक तो ये बालवीर खबरों में रहते हैं।ये अपने इंटरव्यू देते हैं और फिर ओझल हो जाते हैं।इनके बारे में किसी को कोई खबर नहीं रहती।

गणतंत्र दिवस परेड का 1959 से हिस्सा हैं बालवीर पुरस्कार विजेता। जब ये राजपथ (अब कर्तव्यपथ), इंडिया गेट और राजधानी के दूसरे मार्गों से गुजरते हैं, तो हजारों दर्शक इनका अभिवादन कर रहे होते हैं। ये बीते कुछ साल से खुली जीप में निकलने लगे हैं। हालांकि लंबे समय तक ये हाथियों पर सवार होते थे। पर मेनका गांधी के विरोध के कारण इनके हाथियों पर बैठाने की परंपरा पर विराम लग गया। ये गणतंत्र दिवस परेड से 10 दिन पहले राजधानी में आकर परेड की रिहर्सल में शामिल होते हैं।

इसके अलावा ये दोपहर और शाम को कभी राष्ट्रपति कभी प्रधानमंत्री, रक्षामंत्री, कभी दिल्ली के मुख्यमंत्री और उपराज्यपाल, वायुसेना, नौसेना और थलसेनाध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण व्यक्तित्वों से मिलते हैं। गणतंत्र दिवस से कुछ दिन पहले तक तो ये बालवीर खबरों में रहते हैं। ये अपने इंटरव्यू देते हैं और फिर ओझल हो जाते हैं। इनके बारे में किसी को कोई खबर नहीं रहती। अब हरीश मेहरा को ही लें। उन्हें पहला बालवीर पुरस्कार मिला था। 

उन्होंने पंडित जवाहरलाल नेहरू को एक बड़े हादसे का शिकार होने से बचाया था। वह तारीख थी 2 अक्तूबर,1957। स्थान था दिल्ली का रामलीला मैदान। वक्त होगा शाम के सात-सवा सात बजे का। उस दिन वे राजधानी के रामलीला मैदान में चल रहे एक कार्यक्रम के दौरान वॉलेंटियर की ड्यूटी को अंजाम दे रहे थे। वीआईपी मेहमानों के लिए आरक्षित कुर्सियों पर पंडित नेहरू, इंदिरा गांधी, केंद्रीय मंत्री बाबू जगजीवन राम वगैरह भी उपस्थित थे। तभी उस शामियाने के ऊपर तेजी से आग की लपटें फैलने लगीं जिधर तमाम नामवर हस्तियां बैठी थीं। 

"मैं तुरंत 20 फुट ऊंचे खंभे के सहारे उस जगह पर चढ़ने लगा जिधर आग लगी थी। मेरे पास स्काउट का चाकू भी था। जिधर से आग फैल रही थी, वहां पर पहुंचकर मैंने उस बिजली के तार को अपने चाकू से काट डाला। इस सारी प्रक्रिया को अंजाम देने में मात्र पांच मिनट का वक्त लगा" वे बताते हैं। उस शामियाने के नीचे बैठे तमाम आम और खास लोगों ने हरीश के अदम्य साहस और सूझबूझ को देखा। पर इस दौरान उनके दोनों हाथ बुरी तरह से झुलस गए। उन्हें राजधानी के इरविन अस्पताल (अब लोकनायक जयप्रकाश नायक अस्पताल) में भर्ती कराया गया। 

अगले दिन अस्पताल में उनका हालचाल जानने के लिए बाबू जगजीवन राम स्वयं आए। अब पहला बाल वीर वृद्ध हो चुका है। वे लगभग 78 साल के हो गए हैं। वादे किए गए थे कि उनकी उपलब्धि के चलते सरकार उन्हें सरकारी नौकरी में पदोन्नति देगी। पर वादे तो वादे ही रहे। वे लोअर डिवीजन क्लर्क के पद पर भर्ती हुए और उन्हें 35 सालों की सरकारी नौकरी में एक पदोन्नति मिली। वे कुछ साल पहले रिटायर हुए।

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