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भाजपा के लिए जश्न मनाने का समय?, भारतीय जनता पार्टी ने पूरे किए 45 साल

By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: April 11, 2025 05:30 IST

आपातकाल के बाद जनता पार्टी गठबंधन के प्रयोग के नाटकीय पतन के बाद 6 अप्रैल 1980 को स्थापित भाजपा ने पिछले साढ़े चार दशकों में वास्तव में एक लंबा सफर तय किया है.

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ठळक मुद्देदक्षिणपंथी पार्टी न केवल अस्तित्व में है, बल्कि इसने कई दुर्लभ उपलब्धियां हासिल की हैं. नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने और उनके पार्टी को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के बाद.अनुच्छेद 370 को हटाना और राम मंदिर निर्माण इसके चंद शानदार उदाहरण हैं.

सदस्यता और संगठनात्मक ढांचे के मामले में दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी होने का दावा करने वाली भारतीय जनता पार्टी ने अपने 45 साल पूरे कर लिए हैं. यह उन लोगों के लिए जश्न मनाने का समय है जो इस दल को पसंद करते हैं, इसे मत देते हैं और महसूस करते हैं कि देश का भविष्य इसके नेताओं के सुरक्षित हाथों में है. मणिपुर की हिंसा, बढ़ती महंगाई, सांप्रदायिक दंगे, लोगों का बड़ी संख्या में लगातार भारत छोड़ना, जैव विविधता का तेजी से खत्म होना, नई दिल्ली में भाजपा शासन के तहत सरकारी एजेंसियों का कथित दुरुपयोग और बेरोजगारी आदि से संबंधित अन्य मुद्दों को कुछ समय के लिए अभी मैं अलग रखना चाहूंगा. आपातकाल के बाद जनता पार्टी गठबंधन के प्रयोग के नाटकीय पतन के बाद 6 अप्रैल 1980 को स्थापित भाजपा ने पिछले साढ़े चार दशकों में वास्तव में एक लंबा सफर तय किया है.

दक्षिणपंथी पार्टी न केवल अस्तित्व में है, बल्कि इसने कई दुर्लभ उपलब्धियां हासिल की हैं, खासकर नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने और उनके पार्टी को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के बाद. अनुच्छेद 370 को हटाना और राम मंदिर निर्माण इसके चंद शानदार उदाहरण हैं. चूंकि मुझे इसके कई संस्थापक सदस्यों जैसे अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और कई वरिष्ठ नेताओं जैसे कुशाभाऊ ठाकरे या विजय कुमार मल्होत्रा (वे एक खेल प्रशासक भी थे) के साथ बातचीत करने के अवसर मिले थे, इसलिए मैं देख सकता हूं कि ‘पार्टी विद अ डिफरेंस’ में कितने बड़े बदलाव हुए हैं.

जनसंघ के दिनों सहित कई वर्षों तक भगवा दल को वाजपेयी, आडवाणी, जोशी, राजमाता विजया राजे सिंधिया के चेहरों (और सुंदर भाषणों) के लिए जाना जाता था, जिन्होंने इंदिरा गांधी जैसी मजबूत नेता और एक समय की दुर्जेय पार्टी कांग्रेस का मुकाबला कर इस नवोदित पार्टी का ठोस आधार बनाया था. 1984 में सिर्फ आठ प्रतिशत मत कमाने वाली, दो सांसदों (मेहसाणा से ए.के. पटेल और आंध्र प्रदेश के हनमकोंडा से सी. जंगा रेड्डी) को जितवा सकने वाली पार्टी से, भाजपा ने न केवल संसद के अंदर और बाहर पुरानी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सम्मुख एक लोकप्रिय विकल्प प्रदान किया है.

बल्कि पिछले कुछ वर्षों में इसने लगभग पूरे विपक्ष को धराशायी कर दिया है - जो अप्रत्याशित और अकल्पनीय था. हालांकि केरल और तमिलनाडु अपवाद बने हुए हैं. भाजपा के जबरदस्त नवोदय का श्रेय गुजरात की अजेय जोड़ी नरेंद्र मोदी और अमित भाई शाह को निश्चित रूप से जाता है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर के संगठन के गठन के दिनों में वाजपेयी और आडवाणी की स्थिति और उनकी महत्वपूर्ण भूमिका को कतई भुलाया नहीं जा सकता. उस समय भाजपा के पास न तो अपना कार्यालय था, न गाड़ियां और न ही मोटा बैंक बैलेंस.

उस समय के भाजपा नेता आज की भाजपा से बिल्कुल अलग थे, वे सादगी में अधिक विश्वास करते थे व दिखावे में कम. दूसरा कारण यह था कि उस समय कांग्रेस बहुत मजबूत थी और भारतीय मतदाताओं के एक बड़े वर्ग में लोकप्रिय व आदर्श भी थी. उस समय भाजपा को आज के विपरीत सभी मोर्चों पर भारी संघर्ष करना पड़ा था.

जनसंघ/भाजपा के नेता सादगीपूर्ण जीवन जीते थे, विचारधारा में विश्वास रखते थे, दिखावे से घृणा करते थे और ईमानदारी को बढ़ावा देते थे. प्रधानमंत्री वाजपेयी ने अपनी सरकार बचाने के लिए खरीद-फरोख्त में शामिल होने से साफ  इनकार कर दिया था और आडवाणी ने हवाला के पैसे लेने का आरोप मात्र लगने पर तुरंत लोकसभा सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था.

जब इसके पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष कुशाभाऊ ठाकरे का निधन हुआ, तो अशोक रोड स्थित भाजपा कार्यालय से उनके सामान की बरामदगी आज के भाजपा पार्षद को भी शायद शर्मिंदा कर देगी. वाजपेयी सरकार के समय राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में कार्य करने के बावजूद ठाकरे लगभग निर्धन ही रहे थे. क्या हम आज के राज्य भाजपा प्रमुखों या विधायकों से भी ऐसी उम्मीद कर सकते हैं?

भाजपा अब पूरी तरह बदल चुकी है. एक दशक से भी कम समय में इसमें अविश्वसनीय बदलाव आया है. पुरानी पार्टी अलग ही स्तर पर पहुंच गई है. सत्ता पर कब्जा करना अब एकमात्र उद्देश्य लगता है, ठीक वैसे ही जैसे कांग्रेस ने लोगों और राष्ट्र की सेवा के नाम पर किया था. क्या नई भाजपा पुरानी कांग्रेस की नकल कर रही है?

कुछ राजनीतिक पर्यवेक्षकों का तर्क है कि दोनों मुख्य राजनीतिक दल एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, सिवाय कुछ मुद्दों के, जिनका वे समर्थन करते हैं. यदि भाजपा हिंदुओं का तुष्टिकरण कर रही है, तो कांग्रेस अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण करती नजर आई; यदि कांग्रेस के राज में घोटाले हुए थे, तो भाजपा के राज में भी घोटालों की कमी नहीं है;

यदि मोदी को बदली भू-राजनीतिक परिस्थिति में वैश्विक नेता के रूप में देखा जाता है, तो नेहरू और इंदिरा ने भी आर्थिक शक्ति में बहुत छोटे भारत में वैश्विक ऊंचाइयां हासिल की थीं. यह मानना होगा कि मोदी-शाह ने बहुत कम समय में एक बहुत मजबूत संगठन बनाया है और कई वरिष्ठों को दरकिनार कर देवेंद्र फडणवीस, विष्णु साय या डॉ. मोहन यादव जैसे दूसरी पंक्ति के नेताओं को सामने लाया है, जो भविष्य की भाजपा को आगे बढ़ा सकते हैं.

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