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सत्ता के लिए विचारधारा को परे रखती राजनीति

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: January 9, 2026 09:32 IST

यह कहना शायद अतिशयोक्ति नहीं होगा कि आज सभी पार्टियों में निचले स्तर के अधिकांश नेताओं-कार्यकर्ताओं की आकांक्षा सत्ता सुख भोगने की ही होती है

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ठाणे जिले की अंबरनाथ और अकोला जिले की अकोट नगर परिषद में भाजपा, कांग्रेस तथा अन्य दलों के बेमेल गठबंधन ने सवाल खड़ा कर दिया है कि राजनीति क्या सचमुच ही बिना पेंदी का लोटा बन गई है? हालांकि चौतरफा आलोचनाओं को देखते हुए कांग्रेस ने अंबरनाथ के अपने 12 नगरसेवकों सहित शहर अध्यक्ष को निलंबित कर दिया है तथा शहर कार्यकारिणी भी भंग कर दी है.

उधर अकोला जिले की अकोट नगर परिषद में भाजपा के स्थानीय नेताओं द्वारा बहुमत के लिए एमआईएम, कांग्रेस, शिवसेना के शिंदे गुट और राकांपा के दोनों गुटों को मिलाकर विकास आघाड़ी का गठन किए जाने के चलते भाजपा के पार्टी नेतृत्व ने भी विधायक प्रकाश भारसाकले को नोटिस जारी किया है. हालांकि बवाल मचने के बाद अब सभी राजनीतिक दल अपनी-अपनी सफाई दे रहे हैं और कह रहे हैं कि जिन स्थानीय नेताओं ने अनुशासनहीनता की है उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी, लेकिन हकीकत यह है कि पार्टियों में ऊपरी स्तर पर भले ही विचारधारा का थोड़ा-बहुत असर देखने को मिल रहा हो, निचले स्तर पर तो सारी पार्टियां एक जैसी ही हैं.

यह कहना शायद अतिशयोक्ति नहीं होगा कि आज सभी पार्टियों में निचले स्तर के अधिकांश नेताओं-कार्यकर्ताओं की आकांक्षा सत्ता सुख भोगने की ही होती है, चाहे वह जिस राजनीतिक दल के माध्यम से मिले. शायद यही कारण है कि चुनावों के पहले सत्तारूढ़ राजनीतिक दलों में प्रवेश लेने वाले नेताओं-कार्यकर्ताओं की लाइन लग जाती है. लेकिन पार्टी का चुनावी टिकट पाने का सपना पालने वाले यही नेता जब खुद को इससे वंचित होता पाते हैं तो विद्रोह करने लगते हैं.

महाराष्ट्र में पिछले दिनों विभिन्न राजनीतिक दलों से मनपा चुनाव लड़नेे के इच्छुक उम्मीदवारों ने टिकट नहीं मिलने पर जो भारी हंगामा मचाया, वह सत्ता-सुख की राजनीति की आज की कठोर हकीकत को ही दर्शाता है. वैसे राजनीति में यह कोई नया ट्रेंड नहीं है.

राजनीतिक दल-बदल की जिस प्रवृत्ति को लेकर ‘आया राम-गया राम’ का मुहावरा बना है, वह 1967 में हरियाणा के विधायक गया लाल के संदर्भ में मशहूर हुआ, जिन्होंने दो सप्ताह के भीतर कई बार अपनी निष्ठा बदली थी. इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि राजनीति में गिरावट का दौर कितना पुराना है. हां, यह अवश्य है कि हाल के वर्षों में इसमें बहुत तेजी आई है.

निश्चित रूप से सभी राजनीतिक दलों को मिलकर इस पर विचार करने की जरूरत है, ताकि राजनीति की बची-खुची विश्वसनीयता को भी खत्म होने से बचाया जा सके.

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