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पीयूष पांडे का ब्लॉग: सरकार चलाने का फॉर्मूला

By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: February 8, 2020 08:04 IST

फर्ज कीजिए देश चलाने का ठेका अमेजन को दे दिया जाए तो  लफड़ा ही खत्म हो जाएगा. अमेजन चाहेगी कि कराची के मसाले और आगरा का पेठा बिना झमेले के इधर-उधर जाएं. पब्लिक को हर दो-चार महीने में लुभावने ऑफर मिलेंगे. अमेजन के पास पैसे की कमी नहीं तो क्या पता कभी अचानक खाते में 15 लाख रु. आ जाएं.

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इन दिनों एलआईसी को लेकर एक चुटकुला वायरल है कि जीवन बीमा देने वाली एलआईसी को अब खुद बीमे की जरूरत है. सरकार धीरे-धीरे एलआईसी से ब्रेक-अप करने के मूड में है. वैलेंटाइन्स आने से पहले आईडीबीआई बैंक से भी ब्रेक-अप हो गया है. एयर इंडिया को भी सरकार ने उसी तरह धीरे से बाय बोल दिया है, जिस तरह भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने कभी सुनील गावस्कर या कपिल देव जैसे दिग्गजों को बोल दिया था. ऐसा लगता है कि सरकार को सरकारी उपक्रम अब उतने ही नापसंद हो चले हैं, जितना पाकिस्तान को हिंदुस्तान.

सरकार अब विनिवेश का गाना गुनगुना रही है. निजीकरण की पट्टी आंखों पर बांधकर देश की बाइक चलाने का स्टंट कर रही है. निजीकरण का फायदा बताने वाले बताते हैं कि सरकारी उपक्रम को निजी कंपनी को सौंपते ही मामला जम जाता है.

सरकारी राज में जो कर्मचारी लंच टाइम में लूडो खेलते हैं, कंपनी बिकते ही उनका लंच खाना मुहाल हो जाता है. प्राइवेट कंपनियों में लोग काम के वक्त तो काम करते ही हैं, आराम के वक्त भी बॉस का फोन उन्हें काम में लगाए रखता है.

निजी कंपनियों के कर्मचारी छुट्टी कम लेते हैं और ज्यादा चूं चां नहीं करते. अब देखिए सरकार आजादी के बाद से ट्रेन चला रही है. रेलवे ने देर से चलने के मामले में इतनी ख्याति अर्जित कर डाली कि लोग ट्रेन के निर्धारित वक्त से आधा घंटे बाद तो घर से निकलते हैं. लेकिन अब सरकार ट्रेन प्राइवेट हाथ में दे रही है. प्राइवेट हाथ में आते ही मामला चकाचक हो रहा है. प्राइवेट ट्रेन तेजस देर से चलने पर यात्रियों को मुआवजा दे रही है.

सरकार भी मानती है कि निजी हाथों में अलग जादू है. प्राइवेट शब्द में अलग ‘वेट’ है, जिससे सरकारी कंपनी झटके में पटरी पर आ जाती है. इस थ्योरी पर अपना एक सुझाव है. क्यों न सरकार खुद ही खुद को आउटसोर्स कर दे.

फर्ज कीजिए देश चलाने का ठेका अमेजन को दे दिया जाए तो  लफड़ा ही खत्म हो जाएगा. अमेजन चाहेगी कि कराची के मसाले और आगरा का पेठा बिना झमेले के इधर-उधर जाएं. पब्लिक को हर दो-चार महीने में लुभावने ऑफर मिलेंगे. अमेजन के पास पैसे की कमी नहीं तो क्या पता कभी अचानक खाते में 15 लाख रु. आ जाएं.

जब विनिवेश और निजीकरण ही अंतिम सत्य है तो राजनेता सरकार का विनिवेश कर खुद पूर्णकालिक नारेबाज हो सकते हैं.

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