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नव-संवत्सर: नई शुरुआत का दिन, पढ़ें ऋतुपर्ण दवे का ब्लॉग

By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: March 25, 2020 08:33 IST

शक संवत को भले ही भारत का राष्ट्रीय कैलेंडर माना गया हो लेकिन भारतीय पंचांग का आधार विक्रम संवत है जिसका संबंध राजा विक्रमादित्य के शासन काल से है. दोनों भारतीय कैलेंडर हैं जो समय गणना की हिंदू पंचांग प्राचीन पद्धति है. शक संवत का प्रारंभ कुषाण वंश के शासक कनिष्क ने 78 ई.पू.किया था जबकि विक्रम संवत की शुरुआत राजा विक्रमादित्य ने 57 ई.पू. में की थी.

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नव-संवत्सर हिंदू नववर्ष का आरंभ है जो चैत्न मास की शुक्ल प्रतिपदा को शक्ति-भक्ति की उपासना, नवरात्रि के साथ प्रारंभ होता है. पंचांग रचना का भी यही दिन माना जाता है. महान गणितज्ञ भास्कराचार्य ने इसी दिन सूर्योदय से सूर्यास्त तक दिन, महीना और वर्ष की गणना कर पंचांग की रचना की थी. भारत सरकार का पंचांग शक संवत भी इसी दिन से शुरू होता है. भारत के लगभग सभी प्रांतों में यह नववर्ष अलग-अलग नामों से मनाया जाता है.

पुरातन ग्रंथों और वेदों में भी नव-संवत्सर का वर्णन है. यजुर्वेद के 27वें और 30वें अध्याय में क्रमश: 45वें और 16वें मंत्न में इसे विस्तार से दिया गया है. इसकी पुष्टि ऋग्वेद के ऋत सूक्त से भी होती है जिसमें कहा गया है कि प्रजापति ने सूर्य, चंद्र, नक्षत्न, स्वर्ग, पृथ्वी, अंतरिक्ष को रचा और तभी से नव-संवत्सर का आरंभ हुआ.

सृष्टि संवत् के प्रारंभ का भी यही समय माना जाता है. नवसंवत्सर की प्रामाणिकता इसी से सिद्ध होती है कि नवंबर 1952 में भारतीय वैज्ञानिक और औद्योगिक परिषद द्वारा एक पंचांग सुधार समिति की स्थापना की गई थी, जिसने 1955 में रिपोर्ट सौंपकर शक संवत को राष्ट्रीय सिविल कैलेंडर के रूप में भी स्वीकारने की सिफारिश की थी. इसके बाद ही जहां सरकार के अनुरोध पर ग्रेगोरियन कैलेंडर को सरकारी कामकाज हेतु उपयुक्त मानते हुए भी 22 मार्च 1957 को शक संवत् आधारित पंचांग को राष्ट्रीय कैलेंडर के रूप में स्वीकारा गया जिसमें चैत्न मास भारतीय राष्ट्रीय पंचांग का पहला महीना होता है.

शक संवत को भले ही भारत का राष्ट्रीय कैलेंडर माना गया हो लेकिन भारतीय पंचांग का आधार विक्रम संवत है जिसका संबंध राजा विक्रमादित्य के शासन काल से है. दोनों भारतीय कैलेंडर हैं जो समय गणना की हिंदू पंचांग प्राचीन पद्धति है. शक संवत का प्रारंभ कुषाण वंश के शासक कनिष्क ने 78 ई.पू.किया था जबकि विक्रम संवत की शुरुआत राजा विक्रमादित्य ने 57 ई.पू. में की थी.

जहां शक संवत की पहली तिथि चैत्न मास के शुक्ल पक्ष से शुरू होती है वहीं विक्रम संवत पूर्णिमा के बाद कृष्ण पक्ष से प्रारंभ होता है. दोनों संवतों के महीनों के नाम एक ही हैं अंतर मात्न तिथियों की शुरु आत में हैं. विक्रम संवत का संबंध किसी धर्म विशेष से न होकर संपूर्ण धरा की प्रकृति और ग्रह-नक्षत्नों से है जो कि वैज्ञानिक आधार और वैश्विक स्वीकार्यता के संभावित कारण तो हैं ही, साथ ही भारत की गौरवशाली परंपरा हैं.

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