केंद्रीय मंत्रिमंडल ने प्रधानमंत्नी फसल बीमा योजना को वैकल्पिक बनाने का फैसला लिया. 18 फरवरी, 2016 को जब प्रधानमंत्नी नरेंद्र मोदी ने यह योजना लागू की थी तो इसे किसानों का भाग्य बदलने वाली योजना माना गया था क्योंकि इसमें किसान को फसल बीमा के लिए मात्न डेढ़ से दो फीसदी का (रबी और खरीफ की फसलों पर) प्रीमियम देना था, बाकी प्रीमियम आधा-आधा केंद्र और संबंधित राज्य सरकार को देना था. लेकिन अब इसे वैकल्पिक करने का सीधा मतलब है कि योजना जमीन पर अमल के स्तर पर अच्छी नहीं थी वरना किसान खुद ही दौड़ कर उसका लाभ लेता.
सरकार स्वयं भी कह रही है कि इसे वैकल्पिक करने का दबाव किसान संगठनों ने डाला था यानी किसान इससे खुश नहीं था. इसके तहत ऋण लेने वाले किसानों के लिए यह अनिवार्य था और अन्य के लिए वैकल्पिक. नए फैसले के तहत अब ऋण लेने वाले किसान के लिए भी फसल का बीमा कराना अनिवार्य नहीं होगा. यह भी फैसला लिया गया कि क्षेत्नीय भौगोलिक जरूरतों के हिसाब से भी किसान ओलावृष्टि (पंजाब, पश्चिमी यूपी और हरियाणा), बाढ़ (बिहार) या सूखा (गुजरात व राजस्थान ) का बीमा करा सकते हैं.
आखिर क्या वजह थी कि किसान ने डेढ़ फीसदी पर भी अपनी फसल का लागत मूल्य बीमित नहीं कराना चाहा? हाल ही में राजस्थान के सदन में एक विपक्षी नेता के सवाल का कृषि मंत्नी जवाब नहीं दे पाए और पता चला कि प्रीमियम के 1430 करोड़ रुपए में से मात्न 53 करोड़ ही सरकार ने जमा किया. 12 लाख किसानों के बीमा-राशि से वंचित होने की बात मंत्नी ने भी मानी जबकि राज्य का 37 लाख किसान इससे प्रभावित है.
भाजपा-शासित राज्यों खासकर यूपी और बिहार में स्थिति और खराब है. लेकिन सरकार को अपने निकम्मेपन पर शायद ही पछतावा हो. केंद्र की इस फ्लैगशिप योजना के चार साल बाद भी केवल 23 फीसदी किसान बीमा करवाते हैं. जिसे देखते हुए केंद्र ने यह भी फैसला लिया कि वह कुल वास्तविक प्रीमियम (जो कंपनियों को दिया जाता है) का केवल 30 प्रतिशत ही देगी यानी बाकी राज्य सरकारें वहन करें.
जाहिर है जो राज्य सरकारें अभी तक अपना 48 फीसदी हिस्सा नहीं देती थीं वे कैसे 68 प्रतिशत देंगी. इसलिए केंद्र सरकार की यह बेहद लाभदायी योजना राज्य सरकारों की आपराधिक निष्क्रियता और भ्रष्टाचार की चौखट पर दम तोड़ गई और केंद्र सरकार ने भी उसके ताबूत में आखिरी कील ठोंकने के लिए अपना हिस्सा घटा दिया. बहरहाल यहां ध्यान देने की बात यह है कि चार साल में भाजपा की सरकार केंद्र में ही नहीं डेढ़ दर्जन राज्यों में भी रही.
क्या प्रधानमंत्नी अपनी इस फ्लैगशिप योजना के लिए उनके मुख्यमंत्रियों पर अमल के लिए दवाब नहीं डाल सकते थे? उदाहरण के लिए मध्य प्रदेश ने सन 2018 के प्रीमियम का अपने हिस्से का 1500 करोड़ रु. आज तक नहीं दिया है जिससे किसानों को उनकी बीमा-राशि नहीं मिल पाई है. उस वर्ष भाजपा सरकार शासन में थी और राज्य में चुनाव भी वर्ष के अंत में ही हुए थे. किसानों के वोट के लिए चुनाव के दौरान कर्ज माफकरने वाली सरकारें इस वर्ग की असली समस्या के प्रति इतनी उदासीन रही हैं कि कई राज्यों के कृषि बजट का आधा हिस्सा फसल बीमा योजना के प्रीमियम के बराबर होता है.
दरअसल इस योजना को लागू करने के पहले केंद्र सरकार को राज्यों से बात करनी चाहिए थी क्योंकि प्रीमियम का आधा भाग उन्हीं को देना था और योजना अमल में लाना भी उन्हीं के जिम्मे था. आज किसानों का भाग्य बदलने वाली फसल बीमा योजना दम तोड़ती जा रही है.