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पुण्य प्रसून वाजपेयी का ब्लॉग: उच्च शिक्षा में फिसड्डी रहकर कैसे बनेगा विश्वगुरु?

By पुण्य प्रसून बाजपेयी | Updated: September 17, 2019 05:03 IST

अब दुनिया के टॉप 300 यूनिवर्सिटी में भी भारत का कोई शिक्षण संस्थान नहीं है. फिर भारत अपनी जीडीपी और तीन ट्रिलियन की इकोनॉमी समेटे ऐसा देश है जहां शिक्षा पर सबसे कम बजट (जीडीपी का 1.8 फीसदी) है. दुनिया में सबसे कम रिसर्च भारत में ही होते हैं और..

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ठळक मुद्देभारत दुनिया के उन देशों में है जहां उच्च शिक्षा का स्तर बेहद निम्न होने की वजह से सबसे ज्यादा छात्न विदेश पढ़ने जाते हैं.भारत ही वो देश है जहां धीरे-धीरे विदेशी छात्न पढ़ने के लिए आना पसंद नहीं कर रहे हैं. तो क्या भारत में उच्च शिक्षा की तरफ  किसी का ध्यान नहीं है?

यूपी के तीन कॉलेज बिकाऊ हैं. जो पार्टी कॉलेज चलाने की इच्छुक है, वह बोली लगाए और कॉलेज ले जाए. दिल्ली यूनिवर्सिटी के पास अब इतना धन नहीं है कि वह एडहॉक प्रोफेसरों से छात्रों को पढ़वाए. तो 20 नवंबर के बाद खाली पदों को भरा जाएगा और जब तक पदों पर भर्ती नहीं होती तब तक गेस्ट प्रोफेसर पढ़ाएंगे. यानी दिल्ली यूनिवर्सिटी के साढ़े चार हजार एडहॉक प्रोफेसरों को महीने में जो 85 हजार से सवा लाख तक देने पड़ते थे, अब गेस्ट प्रोफेसर को 18 हजार से 50 हजार रु. महीने तक ही देने पडेंगे. 

और अब दुनिया के टॉप 300 यूनिवर्सिटी में भी भारत का कोई शिक्षण संस्थान नहीं है. फिर भारत अपनी जीडीपी और तीन ट्रिलियन की इकोनॉमी समेटे ऐसा देश है जहां शिक्षा पर सबसे कम बजट (जीडीपी का 1.8 फीसदी) है. दुनिया में सबसे कम रिसर्च भारत में ही होते हैं और भारत दुनिया के उन देशों में है जहां उच्च शिक्षा का स्तर बेहद निम्न होने की वजह से सबसे ज्यादा छात्न विदेश पढ़ने जाते हैं और भारत ही वो देश है जहां धीरे-धीरे विदेशी छात्न पढ़ने के लिए आना पसंद नहीं कर रहे हैं. तो क्या भारत में उच्च शिक्षा की तरफ  किसी का ध्यान नहीं है?

2014 में जीत के बाद प्रधानमंत्नी मोदी ने कृषि महाविद्यालय यूपी में खोलने का जिक्र किया. 2017 में बीजेपी की सत्ता आई तो हरदोई में कृषि महाविद्यालय खोला गया. साढ़े छह हेक्टेयर जमीन पर यह राजकीय कृषि महाविद्यालय खुला. छात्र-छात्राओं के लिए छात्रावास बना लेकिन महज तीन बरस में योगी सरकार ने मान लिया कि उसके पास पैसा नहीं है कि वह महाविद्यालय चला पाए तो 9 सितंबर 2019 को सरकार ने हरदोई के कृषि महाविद्यालय के साथ उन्नाव के राजकीय महाविद्यालय और सुल्तानपुर के राजकीय महाविद्यालय को पीपीपी मॉडल पर चलाने का ऐलान करते हुए कहा कि 12 सितंबर तक जो प्राइवेट पार्टी कालेज चलाने में दिलचस्पी रखती है, वह सामने आए, लेकिन कोई सामने नहीं आया. 

शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने अनौपचारिक बातचीत में कहा, सरकार मानती है कोई प्राइवेट पार्टी कॉलेज चलाएगी तो सरकार को टैक्स देगी. फिर सरकार को महाविद्यालय के लिए कोई बजट भी जारी करना नहीं होगा, यानी दूसरी बार मोदी के पीएम पद की शपथ लेने के तीन दिन के भीतर ही जो नई एजुकेशन पॉलिसी- 2019 सामने आई और उसमें शिक्षा के निजीकरण के खुले संकेत दे दिए गए, उसका पहला प्रयोग उत्तर प्रदेश से शुरू हुआ है.

राजनीति ने शिक्षण संस्थानों को ही नहीं, बल्कि शिक्षा देने के तरीके से भी खिलवाड़ शुरू कर दिया है जबकि भारत का सच तो यह भी है कि अगले बरस भारत की औसत उम्र 29 बरस होगी, चीन की 37 बरस और जापान की 48 बरस होगी. यानी भारत एक लिहाज से शिक्षा हासिल करने से लेकर अलग-अलग क्षेत्न में रिसर्च करने और रोजगार पाने के लिए सबसे ज्यादा आंतरिक डिमांड पर होगा. फिर वर्ल्ड बैंक की ही रिपोर्ट साफ तौर पर कहती है कि जिस देश में रिसर्च सबसे ज्यादा होता है, छात्र इनोवेशन के साथ यूनिवर्सिटी से निकलते हैं, वह देश आर्थिक तौर पर अपने नायाब कार्यक्रमों की वजह से ज्यादा उन्नति करता है. 

तो आखिरी सवाल यही है कि डांवाडोल इकोनॉमी की छांव तले जब उच्च शिक्षा सत्ताधारियों की प्राथमिकता में है ही नहीं तो फिर भारत में नए इनोवेशन के साथ कौन से स्टार्ट-अप शुरू होंगे और आर्थिक संकट से उबारने के लिए कौन सा दिमाग भविष्य में काम करेगा, जब सबसे युवा देश को उच्च शिक्षा देने की भी स्थिति में हम नहीं हैं.

टॅग्स :एजुकेशनइंडियादिल्ली विश्वविद्यालय
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