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कृष्णप्रताप सिंह का ब्लॉग: राजनीति में अजातशत्रु थे चंद्रशेखर

By कृष्ण प्रताप सिंह | Updated: April 18, 2023 15:26 IST

आधी शताब्दी से भी ज्यादा लंबी अपनी राजनीतिक पारी में देश के पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने दो चीजों का बहुत मुखर विरोध किया। पहली राजनीतिक छुआछूत और दूसरी वंशवाद।

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ठळक मुद्देपूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर को राजनीति का ‘अजातशत्रु’ कहा जाता हैचंद्रशेखर कभी आलोचकों के मुंह नहीं लगेसाथियों के एतराज के बावजूद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यक्रम में जाते थे

नई दिल्ली: देश के पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर को, जिनकी आज 17 अप्रैल को जयंती है, भारतीय राजनीति का ‘अजातशत्रु’ कहा जाता है। ऐसा व्यक्तित्व जिसे नापसंद करने वालों के पास भी उसके विरुद्ध कहने के लिए कुछ खास नहीं होता था। न जली-कटी और न गिले-शिकवे। अलबत्ता 1989 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की राजीव गांधी सरकार की बेदखली के बाद बनी विश्वनाथ प्रताप सिंह की राष्ट्रीय मोर्चा सरकार गिरने के बाद कांग्रेस के समर्थन से प्रधानमंत्री और थोड़े ही दिनों बाद ‘भूतपूर्व प्रधानमंत्री’ बन बैठने के लिए उन्होंने ढेरों आलोचनाएं झेलीं। इसके बावजूद वे अपने को अजातशत्रु बनाए रख सके तो इसलिए कि न कभी आलोचकों के मुंह लगे, न ही उनसे खुन्नस निकालने के फेर में पड़े.।

हां, आधी शताब्दी से भी ज्यादा लंबी अपनी राजनीतिक पारी में उन्होंने दो चीजों का बहुत मुखर विरोध किया। पहली राजनीतिक छुआछूत और दूसरी वंशवाद। जहां तक राजनीतिक छुआछूत की बात है, आठ जुलाई, 2007 को ली गई अपनी अंतिम सांस तक, गलत समझे जाने का खतरा उठाकर भी, वे उसके विरोध पर दृढ़ रहे। तब भी, जब भारतीय जनता पार्टी उसकी सबसे बड़ी शिकार थी और उनके कई मित्र कहते थे कि उसके प्रति छुआछूत के विरोध से उन्हें उसका शुभचिंतक मान लिया जाएगा, जो उनकी युवा तुर्क व समाजवादी छवि के प्रतिकूल होगा।

स्वदेशी और स्वावलंबन की भावना को प्रश्रय देने के लिए वे अपने साथियों के एतराज के बावजूद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आनुषंगिक संगठन स्वदेशी जागरण मंच द्वारा इस उद्देश्य से आयोजित कार्यक्रमों में जाया करते थे और प्रायः कहते थे कि हममें से किसी को भी यह अधिकार नहीं है कि वह बेवजह दूसरों की देशभक्ति पर शक करता घूमे।

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