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गुरु पूर्णिमा की प्रासंगिकता

By लोकमत समाचार हिंदी ब्यूरो | Updated: July 28, 2018 09:35 IST

गुरु और उनके आश्रमों या पाठशालाओं ने आज के बोर्डिग स्कूलों की तरह भूमिका निभाई है और छात्रों का पूरा बचपन तथा किशोरावस्था भी गुरुकुल में ही बीतती थी, जहां वे ब्रह्मचर्य का पालन करते थे। लेकिन तब भी ऐसा कोई नियम नहीं था कि वे किसी माह या दिन विशेष को ही वहां प्रवेश करेंगे।

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गुरु हालांकि प्राचीन हिंदू धर्म का एक अभिन्न हिस्सा रहे हैं, आषाढ़ महीने की पूर्णिमा को उनके सम्मान में मनाने के पीछे बौद्ध और जैन धर्म का भी योगदान है। हालांकि ऋग्वेद में बहुत सम्मान के साथ गुरु का उल्लेख है जैसा कि उसके स्तोत्र 4.5.6 से स्पष्ट है और छांदोग्य उपनिषद के अध्याय 4.4 में तथा तैत्तिरीय के तीसरे अध्याय में भी गुरु का वर्णन है, लेकिन तथ्य यह है कि गुरु-पूजा के लिए तब कोई दिन विशेष निर्धारित नहीं था। 

गुरु और उनके आश्रमों या पाठशालाओं ने आज के बोर्डिग स्कूलों की तरह भूमिका निभाई है और छात्रों का पूरा बचपन तथा किशोरावस्था भी गुरुकुल में ही बीतती थी, जहां वे ब्रह्मचर्य का पालन करते थे। लेकिन तब भी ऐसा कोई नियम नहीं था कि वे किसी माह या दिन विशेष को ही वहां प्रवेश करेंगे। जो गुरु कोई विशिष्ट कौशल सिखाते थे, जैसे द्रोणाचार्य ने कौरवों और पांडवों को धनुर्विद्या सिखाई, उनके बारे में कोई ऐसा उल्लेख नहीं मिलता कि उन्होंने किसी दिन विशेष को ही अपने शैक्षिक सत्र का शुभारंभ किया था। जबकि बाद के आध्यात्मिक गुरुओं के शैक्षिक सत्र के आरंभ और समाप्ति का विशेष रूप से उल्लेख मिलता है।

बौद्ध धर्म में आषाढ़ पूर्णिमा का स्पष्ट उल्लेख मिलता है जिसे पाली में वर्षा के मौसम की शुरुआत के रूप में वर्णित किया गया है। जब भिक्षु मानव बस्तियां छोड़कर दूर गुफाओं और मठों में एकत्रित होते हैं। वहां कुछ पाठय़क्रम अन्य श्रद्धालुओं के लिए उपलब्ध थे, जो सीखने में रुचि रखते थे, जैसे कि धर्मशास्त्र या आत्म सुधार अथवा प्राकृतिक लाभ के लिए कुछ ध्यान अनुशासन। 

आषाढ़ की पूर्णिमा तक मानसून देश के लगभग सभी हिस्सों में पहुंच जाता था। यह एक ऐसा दिन था जब छात्रों का समूह अपने शिक्षकों के सामने उपस्थित होता था और   त्रैमासिक पाठय़क्रम शुरू करता था। समकालीन जैन धर्म में इससे चातुर्मास की शुरुआत होती थी और आज तक यह परंपरा चली आ रही है। वे मानते हैं कि इसी दिन र्तीथकर महावीर ने गौतम स्वामी को अपना पहला शिष्य बनाया था।

बौद्ध परंपरा के अनुसार ज्ञान प्राप्त करने के एक महीने बाद, आषाढ़ पूर्णिमा के दिन ही बुद्ध ने अपने पांच पूर्व साथियों को सारनाथ में पहला धर्मोपदेश दिया था, जिसे धर्मचक्र प्रवर्तन सूत्र कहते हैं।

हिंदुओं ने हालांकि दोनों अन्य संगठित धर्मो की सवरेत्तम प्रथाओं के अनुकूलन में ज्यादा समय नहीं लगाया। बौद्ध और जैन धर्म में विद्वानों के बीच समय-समय पर मुलाकात होती थी। तुलना में हिंदू धर्म एक धर्म के रूप में कम संगठित था और उसमें एक निश्चित संरचना का अभाव था, जब तक कि एक हजार साल बाद शंकराचार्य और अन्य महान आचार्यो का आगमन नहीं हुआ। व्यास मुनि का आगमन भी बहुत बाद की बात है जिन्होंने गुरु को समर्पित गुरु गीता की रचना की। गुरु पूर्णिमा की महत्ता बताने वाली अन्य लिखित सामग्री भी बाद की है, जैसे कि वराह पुराण। 

भिक्षुओं या साधु-संतों के चार महीने तक कृषक समुदाय से दूर रहने के पीछे दृष्टिकोण यह था कि इस दौरान वे कृषि कार्य में अत्यंत व्यस्त होते थे। वे बारिश के दौरान खेतों और जंगलों में पानी के कारण सांपों के अनावश्यक खतरों के प्रति भी सचेत थे। श्रवण, भाद्रपद, अश्विन और कार्तिक के चार महीनों में से स्थानीय आवश्यकताओं और बारिश के स्थानीय चरित्र के हिसाब से तीन महीने के पाठय़क्रम के लिए समय निकाला जाता था। अधिक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि गुरु की आर्थिक आवश्यकताओं के मद्देनजर दान-दक्षिणा की अनिवार्य प्रथा उपयोगी थी। भक्ति आंदोलन, जो चौदहवीं से सोलहवीं शताब्दी के बीच उत्तर भारत में अपने शिखर पर था, का नेतृत्व गुरुओं ने किया था, जिन्होंने हिंदू धर्म को लोकप्रिय बनाने के लिए काफी काम किया। इसने भी गुरु पूर्णिमा उत्सव को व्यापक बनाने में काफी मदद की।

इस प्रकार, इस उपमहाद्वीप में बारिश के मौसम का सबसे अच्छा उपयोग करने के लिए जो सुविधाजनक या अपरिहार्य अभ्यास शुरू किया गया था, वह सदियां बीतने के साथ ज्ञान और कला की परंपराओं के संचारण की एक व्यावहारिक संस्था में बदल गया - जिसके केंद्र में गुरु थे और जिन्हें सम्मान देने के लिए धार्मिक उत्सव की शुरुआत हुई।  देश-दुनिया की ताज़ा खबरों के लिए यहाँ क्लिक करे. यूट्यूब चैनल यहाँ सब्सक्राइब करें और देखें हमारा एक्सक्लूसिव वीडियो कंटेंट

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