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संतोष देसाई का ब्लॉगः समाज में बढ़ता डिजिटल हस्तक्षेप

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: October 24, 2019 21:13 IST

तकनीकी ज्ञान के क्षेत्र में प्रगति बहुत तेजी से हो रही है, जबकि सामाजिक बदलाव धीरे-धीरे हो रहा है. इस क्रम में तकनीक अपने ही तरीके से सामाजिक रचना में बदलाव कर रही है. भले ही यह जानबूझकर न किया जा रहा हो, लेकिन इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि ऐसा हो रहा है.

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संतोष देसाई पिछले दिनों अमेरिका में कई डेमोक्रेट सांसदों ने ट्विटर से मांग की थी कि वह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का ट्विटर अकाउंट निलंबित करे. यह मांग क्यों की गई और इसमें कितना दम है, यह अलग बात है, लेकिन इससे पता चलता है कि दुनिया किस तरह से बदल रही है. सामान्य तौर पर  सरकार से किसी निजी संस्था पर नियंत्रण रखने की मांग की जाती है, लेकिन यहां अमेरिका के एक शक्तिशाली राजनीतिक दल के सदस्यों द्वारा निजी क्षेत्र की एक कंपनी से ही देश के राष्ट्रपति पर अंकुश लगाने की मांग की गई. इससे पता चलता है कि शक्ति संतुलन किस तरह से बदल रहा है.

दरअसल तकनीकी ज्ञान के क्षेत्र में प्रगति बहुत तेजी से हो रही है, जबकि सामाजिक बदलाव धीरे-धीरे हो रहा है. इस क्रम में तकनीक अपने ही तरीके से सामाजिक रचना में बदलाव कर रही है. भले ही यह जानबूझकर न किया जा रहा हो, लेकिन इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि ऐसा हो रहा है. प्रौद्योगिकी हमें नई क्षमताएं तो प्रदान करती है, लेकिन वह हमारे जीने के तरीकों में भी परिवर्तन करती है. 

समाज अगर इन परिवर्तनों को पूरी तरह से पचा नहीं पाता तो सामाजिक अव्यवस्था उत्पन्न होती है. पारंपरिक तरीके और मानसिकता इस बदलाव का मुकाबला करने के लिए अपर्याप्त सिद्ध होते हैं.  सोशल मीडिया इस बदलाव का एक उदाहरण है. जहां इसके कई सकारात्मक आयाम है वहीं कुछ चिंता पैदा करने वाले कारक भी हैं. 

दुनिया भर में आज बड़े पैमाने पर ध्रुवीकरण हो रहा है. एक-दूसरे के प्रति द्वेष भाव बढ़ रहा है. फेक न्यूज से वातावरण दूषित हो रहा है और वैचारिक क्षेत्र में असहिष्णुता बढ़ रही है. यह असाधारण बदलाव है और पिछले एक दशक से भी कम समय में हुआ है. इस बदलाव के पीछे हमारे तकनीकी ज्ञान का बहुत बड़ा हाथ है.

कुछ लोगों का तर्क है कि यह आशंका अनावश्यक है और किसी भी तकनीक के समाज के साथ समरस होने से पहले कुछ समय के लिए अव्यवस्था होती ही है. हो सकता है हम संक्रमण काल से गुजर रहे हों, लेकिन एक समय था जब प्रगति के विचार को स्वाभाविक तौर पर सकारात्मक विचार माना जाता था, लेकिन आज हम ऐसा नहीं कह सकते. 

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