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ग्लोबल डिग्निटी डेः हर किसी की गरिमा का रखा जाना चाहिए ध्यान, अश्वनी कुमार का ब्लॉग

By अश्वनी कुमार | Updated: October 27, 2020 13:21 IST

मानवाधिकारों से वंचित रखना और हाशिए पर के बहुतायत लोगों की गरिमा का हनन, दमनकारी सरकार द्वारा मनमाने ढंग से मौलिक स्वतंत्रता का हनन और लोकतंत्र को भयभीत करना भाईचारे के उस संवैधानिक वादे का मखौल उड़ाते हैं, व्यक्तिगत गरिमा जिसका एक प्रमुख घटक है.

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ठळक मुद्देस्पष्ट किया है कि अनुच्छेद 21 के तहत जीवन का अधिकार, गरिमा के बिना ‘एक ऐसी आवाज है जो सुनाई नहीं देती.’ फिर भी विभिन्न अभिव्यक्तियों में गरिमा की निरंतर हानि एक दर्दनाक वास्तविकता बनी हुई है. संविधान के गरिमा के वादे को आगे बढ़ाने में संस्थागत भूमिका और विफलता के बारे में चिंताओं को उठाया है.

ग्लोबल डिग्निटी डे (21 अक्तूबर) पर, भारत ने भी दुनिया के साथ मिलकर मानवीय गरिमा का जश्न मनाया. अफसोस है कि आजादी के सात दशक से अधिक समय बाद भी, एक परिभाषित राष्ट्रीय आकांक्षा की उन्नति के बारे में हमारे कमजोर रिकॉर्ड के कारण सवालिया निशान लगा हुआ है.

भारत 14 करोड़ से अधिक कुपोषित बच्चों (वैश्विक भूख सूचकांक 2020) के साथ वैश्विक भूख सूचकांक पर मूल्यांकित 107 देशों में से 94 वें स्थान पर है. बलात्कार, मुठभेड़ों में मौत, हिरासत में यातनाएं, बड़ों और बच्चों के साथ र्दुव्‍यवहार, बुनियादी मानवाधिकारों से वंचित रखना और हाशिए पर के बहुतायत लोगों की गरिमा का हनन, दमनकारी सरकार द्वारा मनमाने ढंग से मौलिक स्वतंत्रता का हनन और लोकतंत्र को भयभीत करना भाईचारे के उस संवैधानिक वादे का मखौल उड़ाते हैं, व्यक्तिगत गरिमा जिसका एक प्रमुख घटक है.

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने संवैधानिक विवेक के एक रक्षक के रूप में स्पष्ट किया है कि अनुच्छेद 21 के तहत जीवन का अधिकार, गरिमा के बिना ‘एक ऐसी आवाज है जो सुनाई नहीं देती.’ (नवतेज जोहर, 2018). फिर भी विभिन्न अभिव्यक्तियों में गरिमा की निरंतर हानि एक दर्दनाक वास्तविकता बनी हुई है.

कार्यपालिका व न्यायपालिका के समावेश वाली एक दूरगामी महत्व वाली हालिया घटना ने संविधान के गरिमा के वादे को आगे बढ़ाने में संस्थागत भूमिका और विफलता के बारे में चिंताओं को उठाया है. भारत के प्रधान न्यायाधीश के साथ आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री के एक अभूतपूर्व संवाद, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के एक वरिष्ठ न्यायाधीश द्वारा आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के कुछ न्यायाधीशों के जरिये न्याय के प्रशासन में हस्तक्षेप की शिकायत की गई है, संस्थागत अखंडता और गरिमा से समझौता किया गया है.

संवेदनशील विषय पर प्रधान न्यायाधीश के साथ विचाराधीन विषय पर अपने वार्तालाप को सार्वजनिक करके एक राज्य के मुख्य कार्यकारी ने अपने पद के साथ न्याय नहीं किया है. संबंधित न्यायाधीश जहां पद की शपथ लेने के साथ अपनी गरिमा की रक्षा करने के लिए बाध्य होते हैं, वहीं मुख्यमंत्री भी संवैधानिक अनुशासन और सदाचार के उच्च स्तर के पालन की बाध्यता से बच नहीं सकते हैं, जिसकी उनसे उम्मीद की जाती है.

एक मुख्यमंत्री के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्रवाई ही क्या सिर्फ उच्चतर न्यायपालिका की प्रतिष्ठा और गरिमा को बहाल कर सकती है, यह बहस का विषय है. प्रशांत भूषण के मामले में अवमानना की कार्यवाही पर सार्वजनिक प्रतिक्रिया को देखते हुए, मुख्यमंत्री के खिलाफ केवल अकाट्य सबूतों पर आधारित आपराधिक अवमानना का मामला ही दंडात्मक न्यायिक प्रक्रिया पर विश्वसनीयता बरकरार रख सकेगा.

अनियंत्रित मीडिया ट्रायल, विशेष रूप से इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया पर, जो बार-बार निजता के अधिकार के गंभीर उल्लंघन के साथ संवैधानिक सीमाओं को पार करते हैं, अनुच्छेद 21 के तहत निष्पक्ष परीक्षण और उचित कानूनी प्रक्रिया के वादे का मखौल उड़ाते हैं. समानांतर मीडिया ट्रायल पर उच्चतम न्यायालय द्वारा विभिन्न चरणों में कई बाध्यकारी प्रतिबंध लगाने के बावजूद, वे न्याय के मार्ग पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं. उच्चतम न्यायालय की निगाहों के सामने ही यह अवैध कृत्य जारी है.

सुशांत सिंह राजपूत और कंगना रणावत के मामले इसके ज्वलंत उदाहरण हैं. लोगों की स्मृति में अभी भी ऐसे मीडिया ट्रायल के उदाहरण ताजा हैं, जिनमें उमा खुराना (2007), आरुषि तलवार (2017), नम्बी नायरन (2018), हादिया (2018), 2 जी स्पेक्ट्रम केस (2018, पी. चिदंबरम (2019) और चले जा रहे सुनंदा पुष्कर व तरुण तेजपाल मामले का नाम लिया जा सकता है.

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दुरुपयोग से निष्पक्ष परीक्षण की संवैधानिक गारंटी के लगातार उल्लंघन ने यह अनुत्तरित सवाल अपने पीछे छोड़ दिया है कि अभियुक्तों की प्रतिष्ठा और गरिमा को पहुंचाई जाने वाली हानि की न्यायसंगत भरपाई कैसे होगी? 

एक मजबूत प्रतिष्ठित संविधान के बावजूद, हमारे उदार लोकतंत्र का हालिया रिकॉर्ड बताता है कि संवैधानिक लक्ष्यों को हासिल करने में हम पीछे रह गए हैं. लेकिन निराश होने की जरूरत नहीं है क्योंकि हम जानते हैं कि भाग्य की तरह ही हमारी गरिमा भी हमारे भीतर निहित है. इसे सुरक्षित रखने में हमारे प्रतिनिधियों और लोकतांत्रिक संस्थानों की विफलता हमें एक महत्वपूर्ण उद्देश्य के रूप में अपनी प्रतिष्ठा को सदैव आगे रखने से रोक नहीं सकती है.

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