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"बाबूजी धीरे चलना, हां बड़े धोखे इस राह में"?, भाजपा के भीतर और एनडीए गठबंधन में संतुलन पर ध्यान, सीएम सम्राट चौधरी पर हिट हो रहा गाना?

By एस पी सिन्हा | Updated: April 25, 2026 14:36 IST

मंत्रिमंडल में भाजपा से एक ज्यादा जदयू का मंत्री होगा। गृह विभाग के लिए भी दबाव बनाया जाने लगा है। नहीं मिलता है तो ऐसी स्थिति में विधानसभा अध्यक्ष पद की मांग जदयू की ओर से की जा सकती है

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ठळक मुद्देसम्राट चौधरी ने सत्ता संभालते ही विजय सिन्हा को उनकी औकात दिखा दी है। जदयू के मन मुताबिक चलना भी इनके लिए किसी चुनौती से कम नहीं होगी।जदयू विधायक दल का नेता चुने जाते ही श्रवण कुमार ने इसके इशारे दे दिए हैं।

पटनाः बिहार में सत्ता हस्तांतरित करते हुए नीतीश कुमार ने सम्राट चौधरी के सिर पर ताज रख दी है। लेकिन यह ताज कांटों की साबित होती दिख रही है। कहा जाए तो उस गाने की तरह है, "बाबूजी धीरे चलना, प्यार में जरा संभलना, हां बड़े धोखे(कांटे) हैं, बड़े धोखे(कांटे) हैं इस राह में।" भाजपा के भीतर और एनडीए गठबंधन में संतुलन बनाए रखना, विशेष रूप से विजय सिन्हा जैसे वरिष्ठ नेताओं के साथ तालमेल, एक चुनौती है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को तो पहले भाजपा में ही नाराजगी दूर करनी पडेगी। कारण कि पहले इनके समकक्ष रहे पूर्व उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा के लिए इनके समतुल्य कोई पद देना होगा। हालांकि सम्राट चौधरी ने सत्ता संभालते ही विजय सिन्हा को उनकी औकात दिखा दी है। 

दरअसल, उपमुख्यमंत्री सह राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री रहते हुए विजय सिन्हा ने हड़ताली राजस्व पदाधिकारियों(सीओ) को निलंबित कर दिया था। लेकिन मुख्यमंत्री बनते ही सम्राट चौधरी ने उनका निलंबन वापस ले लिया। यह विजय सिन्हा के लिए किसी झटके से कम नहीं माना जा रहा है। इसके अलावे जदयू के मन मुताबिक चलना भी इनके लिए किसी चुनौती से कम नहीं होगी।

बता दें कि जदयू विधायक दल का नेता चुने जाते ही श्रवण कुमार ने इसके इशारे दे दिए हैं। उन्होंने यहां तक कह दिया है कि मंत्रिमंडल में भाजपा से एक ज्यादा जदयू का मंत्री होगा। इसके अलावा गृह विभाग के लिए भी दबाव बनाया जाने लगा है। अगर नहीं मिलता है तो ऐसी स्थिति में विधानसभा अध्यक्ष पद की मांग जदयू की ओर से की जा सकती है।

इसका भी पेंच अभी फंसा हुआ है। इसके साथ ही नीतीश कुमार ने 20 साल तक शासन किया है, जिसके बाद सत्ता संभालना और उनकी परछाई से बाहर निकलना एक बड़ी चुनौती है। जदयू के साथ गठबंधन को संभालना और भाजपा के एजेंडे को लागू करना एक संतुलन का काम है।

भले ही नीतीश कुमार अब मुख्यमंत्री नहीं हैं, लेकिन एनडीए के भीतर उनकी सक्रियता बता रही है कि वे अभी भी बिहार की राजनीति के केंद्र में हैं। राज्यसभा सांसद के तौर पर वे केंद्र और राज्य के बीच एक मजबूत कड़ी का काम कर रहे हैं। अब तक सम्राट चौधरी उपमुख्यमंत्री सह गृह मंत्री थे, पुलिस और आंतरिक सुरक्षा संभाल रहे थे।

लेकिन आपराधिक घटनाओं पर अंकुश लगा पाने में विफल रहे। ऐसे में सम्राट चौधरी को शासन में जीरो टॉलरेंस नीति लाने की संभावना ज्यादा है। अगर सुधरा तो महिलाओं और आम आदमी को राहत मिलेगी और निवेश आएगा। नहीं सुधरा तो एनडी की ‘विकास’ वाली छवि खराब होगी और विपक्ष (राजद) हमला करेगा।

लेकिन बिहार में हालिया घटनाओं के बाद कानून-व्यवस्था को दुरुस्त करना सबसे बड़ी चुनौती है। शपथ लेने के तुरंत बाद उन्हें जान से मारने की धमकी मिलने जैसी घटनाएं (बांका निवासी की गिरफ्तारी) सुरक्षा की चुनौती को दर्शाती हैं। सम्राट चौधरी को न केवल अपराध नियंत्रण में अपनी धाक जमानी होगी, बल्कि पुलिस और प्रशासन की छवि को भी बेदाग रखना होगा।

अगर उनके राज में अपराध का ग्राफ जरा भी ऊपर जाता है, तो सीधे तौर पर उनकी नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठेंगे। इसके साथ ही बिहार की माली हालत को संभालना और चुनावी वादों को पूरा करने के लिए खजाने का प्रबंधन करना एक बड़ा कांटा है, क्योंकि राज्य की आर्थिक स्थिति सीमित संसाधनों वाली है। नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने उन्हें 'सेलेक्टेड सीएम' बताकर तंज कसा है।

विश्वासमत के दौरान तीखी बहस यह संकेत देती है कि विपक्ष हर कदम पर सरकार को घेरेगा। इसके साथ ही चौधरी की उम्र और डिग्री को लेकर उठे विवादों को भी उन्हें संभालना पड़ रहा है, जिसे विधानसभा में भी उठाया गया। ऐसे में यह कहा जाने लगा है कि सत्ता के इस शीर्ष तक पहुंचने का रास्ता जितना रोमांचक था, आगे का सफर उतना ही पथरीला नजर आता है।

इसबीच बिहार विधानसभा में विश्वास मत हासिल करने के बाद शनिवार को मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी सुबह-सुबह एक अणे मार्ग पहुंचे और पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से शिष्टाचार मुलाकात की। इस दौरान केंद्रीय मंत्री और जेडीयू सांसद ललन सिंह भी मौजूद रहे। करीब 20 मिनट तक यह मुलाकात चली।

नेताओं के बीच क्या बात हुई फिलहाल यह स्पष्ट नहीं हो सका है हालांकि ऐसा माना जा रहा है कि कैबिनेट विस्तार को लेकर नेताओं की बीच चर्चा हुई होगी। बता दें कि सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के बाद नीतीश कुमार की उनसे यह पहली औपचारिक मुलाकात थी, जिसे शिष्टाचार भेंट बताया जा रहा है। लेकिन इसके पीछे कैबिनेट विस्तार के बड़े संकेत छिपे हैं।

एनडीए ने 202 सीटों के भारी बहुमत के साथ सत्ता संभाली है, ऐसे में सहयोगियों के बीच विभागों के बंटवारे और नए चेहरों को शामिल करने को लेकर मंथन अंतिम दौर में है। बताया जाता है कि मुख्यमंत्री से मिलने से पहले नीतीश कुमार सुबह उपमुख्यमंत्री बिजेंद्र यादव के आवास पर भी पहुंचे थे।

विजेंद्र यादव न केवल उपमुख्यमंत्री हैं बल्कि जदयू के सबसे वरिष्ठ नेताओं में से एक हैं। एक ही दिन में नीतीश कुमार का पहले उपमुख्यमंत्री और फिर मुख्यमंत्री से मिलना इस बात की पुष्टि करता है कि पर्दे के पीछे सरकार के स्वरूप को अंतिम रूप दिया जा रहा है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि कैबिनेट में क्षेत्रीय और जातीय समीकरणों को साधने की कोशिश की जा रही है।

संभावना जताई जा रही है कि भाजपा कोटे से कई नए और युवा चेहरों को जगह दी जा सकती है, जबकि जदयू अपने अनुभवी मंत्रियों को वापस ला सकती है। चिराग पासवान की पार्टी (लोजपा-रा) और जीतन राम मांझी की पार्टी हम को भी उनके स्ट्राइक रेट के आधार पर सम्मानजनक हिस्सेदारी मिलने की उम्मीद है। इस विस्तार में ‘मिशन 2029’ (लोकसभा चुनाव) की झलक भी देखने को मिल सकती है।

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