महाराष्ट्र 66 वां स्थापना दिवसः विकास की भाषा सिखाता महाराष्ट्र
By Amitabh Shrivastava | Updated: May 1, 2026 05:02 IST2026-05-01T05:02:06+5:302026-05-01T05:02:06+5:30
Maharashtra 66th Foundation Day: छह पड़ोसी राज्य हैं, जो गुजरात, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, तेलंगाना, कर्नाटक और गोवा हैं. इनके अलावा दादरा- नगर हवेली तथा दमन- दीव केंद्र शासित प्रदेश राज्य की सीमा को स्पर्श करता है.

सांकेतिक फोटो
Maharashtra 66th Foundation Day: देश की अर्थव्यवस्था की नींव में अपना सर्वाधिक योगदान देने वाला राज्य महाराष्ट्र आज अपना 66 वां स्थापना दिवस मना रहा है. देश के राज्यों के भाषाई पुनर्गठन के फलस्वरूप एक मई 1960 को महाराष्ट्र को प्रशासनिक स्वीकृति प्राप्त हुई थी. यह राज्य आसपास के मराठी भाषी क्षेत्रों को मिलाकर बनाया गया, जो पहले अलग-अलग प्रशासनों के नियंत्रण में थे.
इनमें मूल ब्रिटिश मुंबई प्रांत में शामिल दमन और गोवा के बीच के जिले, हैदराबाद के निजाम की रियासत के पांच जिले, मध्य प्रांत (मध्यप्रदेश) के दक्षिण के आठ जिले तथा आसपास की ऐसी अनेक छोटी-छोटी रियासतें शामिल थीं, जो समीपवर्ती जिलों में मिल गई थीं. स्पष्ट रूप से राज्य के गठन में मराठी अस्मिता और भाषाई एकरूपता की भावना को पूर्ण सम्मान देते हुए सांस्कृतिक रूप से एकजुट किया गया था.
परंतु साढ़े छह दशक बीत जाने के बावजूद भाषा के नाम पर चिंताओं के बादल छंट नहीं रहे हैं. पहले व्यावसायिक प्रतिष्ठानों, उसके बाद दूसरे राज्यों के लोगों, फिर पाठ्यक्रम और अब ऑटो रिक्शा वालों के लिए मराठी जानना अनिवार्य करना नई चिंताओं को जन्म देता है. यह एक तरफ जहां निवेश के मार्ग में एक बाधा बन सकता है, वहीं दूसरी ओर दुनिया के साथ कदम मिलाने में पीछे रह सकता है.
इतिहास गवाह है कि छत्रपति शिवाजी महाराज के कुशल नेतृत्व में महाराष्ट्र का सर्वांगीण विकास हुआ और राज्य ने अपनी एक अलग पहचान बनाई. शिवाजी महाराज ने स्वराज तथा राष्ट्रीयता की एक नई भावना पैदा की. उनकी प्रचंड शक्ति ने मुगलों को भारत के पश्चिमी और दक्षिणी भाग में आगे नहीं बढ़ने दिया. आधुनिक भारत में स्वतंत्रता संग्राम में महाराष्ट्र सबसे आगे था.
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का जन्म भी यहीं हुआ. अनगिनत नेताओं ने पहले बाल गंगाधर तिलक और बाद में महात्मा गांधी के मार्गदर्शन में कांग्रेस के आंदोलन को आगे बढ़ाया. गांधीजी ने अपने आंदोलन का केंद्र महाराष्ट्र और गांधी युग में राष्ट्रवादी देश की राजधानी रहे वर्तमान वर्धा जिले के सेवाग्राम को बनाया. भौगोलिक दृष्टि से महाराष्ट्र अरब सागर का सीमावर्ती और अनेक पठारों का राज्य है.
राज्य के पश्चिमी किनारे की सह्याद्रि और उत्तरी भाग में सतपुड़ा की पहाड़ियों की देश में अलग पहचान है. राज्य के कुल छह पड़ोसी राज्य हैं, जो गुजरात, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, तेलंगाना, कर्नाटक और गोवा हैं. इनके अलावा दादरा- नगर हवेली तथा दमन- दीव केंद्र शासित प्रदेश राज्य की सीमा को स्पर्श करता है. यदि सभी राज्यों को भाषाई आधार पर विभाजित कर देखा जाए तो हर एक की अपनी अलग भाषा है.
जिसके कारण राज्य के अनेक भागों में अलग-अलग भाषाओं का प्रभाव देखा जाता है. जिसकी अपनी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि भी है और अपनी अलग पहचान ही नहीं, रिश्ते-नाते भी हैं. इसी से राज्य की सहृदयता की छवि बनी है. ठीक इसके विपरीत सभी सीमावर्ती राज्यों में मराठी मानुस को अपना स्थान मिला हुआ है.
इससे शिक्षा, उद्योग, व्यापार और स्वास्थ्य सेवाओं को संबल मिला है. बावजूद इसके महाराष्ट्र में कभी दक्षिण भारतीय, कभी गुजराती और कभी उत्तर भारतीय के नाम पर अपनी राजनीति की दुकान चमकाने का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा. यह तय है कि यदि सर्वांगीण विकास की अपेक्षा रखी जाएगी तो उदार रवैया अपनाना ही होगा.
महाराष्ट्र सरकार की राज्य को वर्ष 2030 तक एक ट्रिलियन डॉलर और 2047 तक पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने की तैयारी है. वर्ष 2025-26 के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार राज्य की अर्थव्यवस्था 7.9 प्रतिशत की दर से बढ़ने का अनुमान है, जो शेष भारत की विकास दर से अधिक है.
वर्ष 2025-26 में सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) 51 लाख करोड़ रुपए (लगभग 615 बिलियन डॉलर) तक पहुंचने की उम्मीद है. वर्तमान में भारत के सकल घरेलू उत्पाद में राज्य का 14.3 प्रतिशत हिस्सा है. महाराष्ट्र भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) प्राप्त करने वाला प्रमुख राज्य है, जिसे 31 प्रतिशत विदेशी निवेश प्राप्त हुआ.
राज्य की अनुमानित प्रति व्यक्ति आय 3,47,903 रुपए है, जो देश की औसत 2.19 लाख रु. से काफी अधिक है. राज्य का सेवा क्षेत्र में 60 प्रतिशत योगदान है. राज्य की नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता 14,113 मेगावाट हो गई है. महाराष्ट्र जब प्रगति के नित्य नए सोपान पर अग्रसर है, तब उन विषयों को हवा देने की कोशिश की जा रही है, जो राज्य की प्रगति में बाधा हैं.
भाषा के मामले में अक्सर दक्षिण के राज्यों का संदर्भ दिया जाता है, लेकिन भाषा के आधार पर उनकी प्रगति की सीमाओं का आंकलन नहीं किया जाता. दूसरी ओर वहां किसी दबाव नहीं, बल्कि स्वप्रेरणा से ऑटो वाले से लेकर सुशिक्षित व्यक्ति तक अपनी भाषा को बोला और पढ़ा जाता है. जहां उन्हें समस्या पैदा होती है, वहां अंग्रेजी का सहारा लेकर बाधा दूर कर ली जाती है.
स्पष्ट ही उनके पास संवाद समस्या दूर करने का विकल्प है, न कि भाषा को लेकर डर या वैमनस्य का वातावरण बनाया गया है. उन्हें व्यक्ति से समस्या नहीं है, वह अपनी भाषा और संस्कृति के प्रति गर्व का विषय है. वह नितांत व्यक्तिगत भी है. राज्य के वरिष्ठ नेता शरद पवार ने भाषाई विवाद पर बताया था कि करीब दो करोड़ लोग महाराष्ट्र से बाहर अन्य राज्यों में रहते हैं.
इन दिनों विदेशों में भी मराठी भाषी लोगों की संख्या हजारों में पहुंच गई है. इसका अर्थ यही है कि आधुनिक युग में आना-जाना स्वभाविक प्रक्रिया है. इसे रोकना संभव नहीं है, बल्कि रोकने का प्रभाव आत्मघाती भी हो सकता है. राज्य में हवाई सेवा, रेल सेवा, सड़क और समुद्री मार्ग से आवाजाही का लगातार विस्तार हो रहा हो तो कहीं न कहीं वृहत् सोच के साथ आगे बढ़ना होगा.
बीते 66 साल में राज्य ने प्रगति के नए आयाम तय किए, जो किसी सीमा में बंधे नहीं हैं. महाराष्ट्र दिवस के अवसर पर विचार योग्य यही है कि देश- दुनिया के उन्नत स्थानों से प्रेरणा लेकर राज्य की उन्नति के लिए सुखद-सुंदर रास्तों की खोज की जाए, न कि बने बनाए रास्तों पर गड्ढे खोदे जाएं.