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राजनीतिक स्वार्थों से ऊपर उठकर जनता का हित सोचें, विश्वनाथ सचदेव का ब्लॉग

By विश्वनाथ सचदेव | Updated: April 21, 2021 17:12 IST

सरकार ने कहा कि तीस साल या उससे अधिक उम्र के लोगों में पहली लहर में कोविड-19 के 67.5 फीसद मामले आये थे, वहीं दूसरी लहर में इस आयुवर्ग के 69.18 प्रतिशत मामले आये.

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ठळक मुद्दे महामारी की पहली लहर में 20 से 30 साल के आयुवर्ग में कोविड-19 के 20.41 प्रतिशत मामले आये.दूसरी लहर में इस आयुवर्ग के 19.35 प्रतिशत मामले रहे.महामारी की पहली लहर में 10 से 20 साल के आयुवर्ग में कोविड-19 के 8.07 प्रतिशत मामले आये थे.

कोरोना की स्थिति भयावह है. यह दूसरी लहर कुछ ज्यादा ही खतरनाक सिद्ध हो रही है. लोगों के कोरोनाग्रस्त होने, मरीज के लिए अस्पतालों के दरवाजे बंद होने, जरूरी दवाओं और ऑक्सीजन की कमी होने, श्मशान में लगातार जलती चिताओं की खबरें अब डराने लगी हैं.

उम्मीद ही की जा सकती है कि जल्दी ही स्थिति सुधरेगी, पर इस दौरान हमारे हुक्मरानों का व्यवहार जिस तरह का रहा है, उसे देखते हुए तो स्थिति के जल्दी सुधरने की उम्मीद भी खुशफहमी ही लगती है.वस्तुत: चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में होने वाले इन चुनावों में कोरोना से बचने के नियमों की जिस तरह धज्जियां उड़ाई गई हैं, वह अपने आप में किसी अपराध से कम नहीं है.

पश्चिम बंगाल में चुनाव लंबे चल रहे हैं इसलिए वहां की बात ज्यादा हो रही है. हमारे नेताओं ने अपने राजनीतिक स्वार्थों के लिए जिस तरह की लापरवाही बरती है, उससे चुनावों में भले ही उन्हें कुछ लाभ मिल जाए, पर देश की जनता को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी.

कोरोना की पहली लहर के समय भी हमारे हुक्मरानों ने लॉकडाउन के निर्णय में देरी की और फिर जल्दबाजी में की गई लॉकडाउन की घोषणा के परिणाम देश ने भुगते. अब जबकि देश कोरोना की सुनामी को ङोल रहा है, यह सवाल बार-बार उठा रहा है कि हमारा नेतृत्व स्थिति की गंभीरता को क्यों नहीं समझना चाहता?

अच्छी बात यह है कि प्रधानमंत्नी ने यह निर्णय लिया है कि अब प्रचार के लिए विशाल सभाएं नहीं होंगी. यहां भी कांग्रेस के नेता राहुल गांधी ने स्वागत-योग्य पहल की है. उनके विरोधी कह सकते हैं कि उन्हें तो एक बहाना मिल गया था अपना सिर छुपाने का, पर राहुल गांधी ने चुनावी सभाएं रद्द करने की पहल करके निश्चित रूप से सराहनीय कदम उठाया है.

यह कदम चुनावी-प्रचार में लगे हर नेता को उठाना चाहिए था. सत्तारूढ़ पक्ष, भले ही वह केंद्र का हो या पश्चिम बंगाल का, को इस दिशा में पहल करनी चाहिए थी. वह विफल रहा. चुनाव-आयोग भी चाहता तो विवेक का परिचय देते हुए चुनावी रैलियों पर प्रतिबंध लगा सकता था. पर उसने भी पता नहीं क्यों, यह काम नहीं किया.

पश्चिम बंगाल और चुनाव वाले अन्य राज्यों में कोरोना कितना फैलता है, यह तो आने वाला कल ही बताएगा, पर हमारे स्वनामधन्य राजनेताओं ने कोई कसर नहीं छोड़ी है कोरोना का स्वागत  करने में. इस समूचे चुनाव-प्रचार के दौरान हमारे राजनीतिक नेतृत्व ने एक गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार का उदाहरण ही पेश किया है.

सत्ता की राजनीति को प्राथमिकता देने वाले हमारे नेता यह भूल गए कि जनतंत्न में राजनीति सत्ता के लिए नहीं, जनता के लिए होनी चाहिए. जनतंत्न जनता की सरकार होती है, और जनता के लिए होती है. जनता के हितों की उपेक्षा करने वाला भले ही और कुछ भी हो, जनता का सच्चा नेता नहीं हो सकता.

जिस दिन प्रधानमंत्नी ने हरिद्वार में एकत्न संत-समाज से प्रतीकात्मक स्नान की अपील की थी, उस दिन देश में कोरोनाग्रस्त होने वाले मरीजों की संख्या एक लाख साठ हजार से अधिक थी. यह तब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा था. और दुर्भाग्य से यह आंकड़ा लगातार बढ़ता जा रहा है.

कह नहीं सकते इस महामारी से हमारी लड़ाई कब तक चलेगी, पर इतना तो कहा ही जा सकता है कि अब इस लड़ाई में कोई भी ढिलाई स्वीकार नहीं होनी चाहिए.   राजनीतिक दलों के स्वार्थ जनता के हितों के समक्ष बेमानी हैं. और जनता के हितों का तकाजा है कि हमारा समूचा राजनीतिक नेतृत्व विवेक का परिचय दे. यह समय एक-दूसरे पर दोषारोपण का नहीं है, एक-दूसरे के साथ मिलकर एक भयावह स्थिति से उबरने का है. सत्ता की राजनीति तो चलती रहेगी, आवश्यकता जनता के हितों की रक्षा करने वाली राजनीति की है. प्रधानमंत्नी पर जनता ने भरोसा किया था इसीलिए उन्हीं को दूसरी बार सत्ता सौंपी.

अब यह उनका दायित्व बनता है कि वह जनता के विश्वास पर खरा उतरने की चुनौती को स्वीकार करें. वे देश के प्रधानमंत्नी हैं   इसलिए उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे दलगत राजनीति से ऊपर उठकर सोचेंगे. आज जो निर्णय लिए जा रहे हैं, वह बहुत पहले  लिए जाने चाहिए थे.  फिर भी दुहराना चाहूंगा कि देर आयद, दुरुस्त आयद. पर क्या बहुत ज्यादा देर नहीं हो गई?

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