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Central Government: निजी सलाहकारों का बढ़ता बोलबाला?, पिछले द्वार से किया प्रवेश...

By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: November 29, 2024 05:25 IST

Central Government: केंद्र और राज्य सरकारों का कामकाज बाहरी सलाहकारों पर तेजी से निर्भर हो रहा है, जिन्हें प्रमुख सलाहकार फर्मों से मोटे वेतन पर काम पर रखा जाता है.

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ठळक मुद्देलोगों का कहना है कि अच्छे शिक्षित युवा भी कई मामलों में रोजगार के लायक नहीं हैं.सरकारी विभाग ‘इन-हाउस विशेषज्ञों’ और प्रतिभाओं पर निर्भर रहने के बजाय बाहरी मदद ले रहे हैं. अर्न्स्ट एंड यंग, पीडब्ल्यूसी, डेलोइट और केपीएमजी से सीधे 1500 सलाहकारों को काम पर रखा गया है.

Central Government: भारत सरकार का वेतन बिल दशकों से सबसे ज्यादा खर्च वाले मदों में से एक है, क्योंकि मंत्रालयों का काम इस विशाल देश के एक कोने से दूसरे कोने तक फैला है. फिर भी इतने सलाहकारों की जरूरत है, यह बात गले नहीं उतरती. एक तरफ जहां शिक्षित युवाओं का एक बड़ा हिस्सा तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के साथ सरकारी नौकरियों की तलाश कर रहा है, वहीं सरकारी हलकों और निजी क्षेत्र में भी रोजगार के अलग-अलग पहलुओं पर गरमागरम बहस चल रही है. कुछ लोगों का कहना है कि अच्छे शिक्षित युवा भी कई मामलों में रोजगार के लायक नहीं हैं.

उन लोगों की तो बात ही छोड़िए जो छोटे से कौशल विकास पाठ्यक्रम पूरे करते हैं. सरकार में इस परिदृश्य के दूसरे पहलू ने हाल ही में दिखाया है कि केंद्र और राज्य सरकारों का कामकाज बाहरी सलाहकारों पर तेजी से निर्भर हो रहा है, जिन्हें प्रमुख सलाहकार फर्मों से मोटे वेतन पर काम पर रखा जाता है. ये सलाहकार कई तरह की सेवाएं देते हैं.

कई सरकारी विभाग ‘इन-हाउस विशेषज्ञों’ और प्रतिभाओं पर निर्भर रहने के बजाय बाहरी मदद ले रहे हैं. एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार भारत सरकार के 40 से अधिक विभागों द्वारा शीर्ष चार एजेंसियों - अर्न्स्ट एंड यंग, पीडब्ल्यूसी, डेलोइट और केपीएमजी से सीधे 1500 सलाहकारों को काम पर रखा गया है, जिनका भारत में बहुत बड़ा कामकाज है.

इन 1500 सलाहकारों के नीचे कई और हैं जिन्हें प्राथमिक सलाहकारों द्वारा काम सौंप दिया जाता है. नौकरशाहों द्वारा भारतीय मतदाताओं, (यानी जनता) को सेवाएं देने में मदद करने के लिए विभिन्न रूपों में असंख्य परामर्श फर्में काम कर रही हैं. केंद्र सरकार के अन्य विभागों (लगभग 75) ने बड़ी संख्या में सेवानिवृत्त अधिकारियों, विषय विशेषज्ञों, युवा पेशेवरों और निचले स्तर के कर्मचारियों जैसे कि कम्प्यूटर ऑपरेटर आदि को अनुबंध पर रखा है. कुछ दिन पहले ही एक मंत्रालय के शीर्ष अधिकारी ने मुझे बताया कि इन सलाहकारों की वास्तविक संख्या का केवल अनुमान ही लगाया जा सकता है.

क्योंकि लगभग हर विभाग ने ‘अच्छी-खासी संख्या’ में बाहरी लोगों को काम पर रखा है. केंद्रीय सरकार के संगठनों की सहायता करने वालों के अलावा, राज्य सरकारों के सलाहकार भी बड़ी संख्या में हैं, जो दिल्ली और लखनऊ, मुंबई और भोपाल में भारी-भरकम वेतन पाने वाले नौकरशाहों और नीति निर्माताओं की सहायता करते हैं.

तो क्या यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि यूपीएससी या राज्य लोक सेवा आयोगों के माध्यम से चुने गए अधिकारियों  की क्षमता या गुणवत्ता कम पड़ रही है? या फिर विभिन्न सरकारी विभागों में, जिनमें पर्याप्त कर्मचारी होने का दावा किया जाता है, काम इतना बढ़ गया है कि बाहरी लोगों की मदद की जरूरत पड़ रही है?

केंद्र सरकार और राज्य सरकार के अधिकारियों को बढ़िया वेतन पैकेज और विभिन्न वेतन आयोगों के लाभ के अलावा लगभग 100-120 दिन की भी छुट्टियां मिलती हैं. भारत सरकार का वेतन बिल दशकों से सबसे ज्यादा खर्च वाले मदों में से एक है, क्योंकि सरकार का आकार बहुत बड़ा है और मंत्रालयों का काम इस विशाल देश के एक कोने से दूसरे कोने तक फैला हुआ है.

फिर भी इतने सारे सलाहकारों की जरूरत है, यह बात गले नहीं उतरती. इस सबसे सवाल उठता है कि सरकार कौन चला रहा है - सरकार द्वारा नियुक्त स्थायी अधिकारी और विशेषज्ञ या निजी सलाहकार? जहां तक सलाहकारों की नियुक्ति का सवाल है, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण, शहरी मामले, कृषि, ग्रामीण विकास, सड़क परिवहन और राजमार्ग जैसे मंत्रालय सबसे ऊपर हैं. लेकिन नतीजा क्या है?

उनका सामूहिक भुगतान बहुत ज्यादा है, लेकिन कोई नहीं जानता कि उन्होंने सरकार को क्या गुणवत्तापूर्ण सलाह या नीतिगत सलाहें दी हैं, जिससे भारतीयों को ज्यादा खुशहाल बनाने के हेतु सरकारी तंत्र को बेहतर बनाया जा सके. उदाहरण के लिए कृषि को ही लें: 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने के सरकार के घोषित वादे के बावजूद, मंत्रालय इसे हासिल नहीं कर पाया है.

कृषि संकट और किसानों की आत्महत्याएं आज भी पहले की तरह जारी हैं. एक और मंत्रालय जो सलाहकारों की बड़ी संख्या में नियुक्ति कर रहा है, वह है राजमार्ग और सड़क परिवहन मंत्रालय. इसके प्रमुख नितिन गडकरी ने बार-बार स्वीकार किया है कि सड़क दुर्घटनाओं और उसके बाद होने वाली मौतों को रोकने में उनके मंत्रालय की विफलता दुनिया में सबसे अधिक है.

पिछले कुछ वर्षों में सड़क इंजीनियरिंग में सुधार करके मौतों को कम करने में इन सलाहकारों के योगदान के बारे में सवाल पूछा जाना चाहिए. अधिकांश सलाहकारों को मंत्रालय द्वारा उचित प्रक्रिया के तहत और काफी अधिक फीस पर नियुक्त किया जाता है. लेकिन उनकी जवाबदेही क्या है? क्या ‘हम भारत के लोग’ सरकारों को दी जा रही उनकी ‘विशेषज्ञ सलाह’ के बारे में कुछ जानते हैं?

आखिरकार, उन्हें भी नौकरशाहों (लोक सेवकों) की तरह भारतीयों द्वारा दिए गए करों से भरे खजाने से ही तो भुगतान किया जाता है. पहले अधिकांश राजमार्ग और अन्य सड़कें पीडब्ल्यूडी या सरकार के राजमार्ग प्राधिकरण द्वारा बनाई जाती थीं. अब उन्हें निजी ठेकेदारों द्वारा बीओटी/बीओओ आधार पर बनाया जाता है और यात्रियों से भारी टोल लिया जाता है.

सरकार द्वारा की जाने वाली कई अन्य सेवाएं या कार्य पिछले कुछ वर्षों में निजी फर्मों के हाथों में चले गए हैं जो भारी शुल्क लेते हैं. फिर सरकार की भूमिका क्या है? ऐसा लगता है कि सलाहकारों ने सरकार में पिछले द्वार से प्रवेश कर लिया है और वे बिना किसी जवाबदेही के सरकार के फैसलों को आकार दे रहे हैं.

टॅग्स :संघ लोक सेवा आयोगUnion Public Service Commissionभारत सरकार
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