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ब्लॉग: रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता भारत के लिए क्यों फायदेमंद है?

By लोकमत समाचार सम्पादकीय | Updated: October 5, 2022 12:22 IST

एक समय था जब हम अपनी रक्षा जरूरतों के लिए रूस पर लगभग पूरी तरह से निर्भर थे. रूस ने हमारा साथ भी पूरी तरह से निभाया, हालांकि अब दुनिया काफी बदल चुकी है.

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आखिरकार पिछले लगभग दो दशकों की मेहनत रंग लाई और देश में विकसित हल्के लड़ाकू हेलिकॉप्टर (एलसीएच) सोमवार को वायुसेना का हिस्सा बन गए, जिन्हें ‘प्रचंड’ नाम दिया गया है. वर्ष 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान इनकी जरूरत महसूस की गई थी और उसके बाद से ही इनके निर्माण की रूपरेखा बननी शुरू हो गई थी. 

लाइट कॉम्बैट हेलिकॉप्टर के पहले प्रोटोटाइप ने 29 मार्च 2010 को पहली उड़ान भरी थी और उसके बाद से लगातार इसपर काम चलता रहा तथा परीक्षण किए जाते रहे. वायुसेना अधिकारियों के अनुसार एलसीएच एडवांस लाइट हेलिकॉप्टर ध्रुव के जैसा है, जिसमें कई स्तरों पर ‘स्टैल्थ’ अर्थात राडार से बचने की खूबी है. साथ ही यह बख्तरबंद सुरक्षा प्रणाली, रात में हमला करने तथा आपात स्थिति में सुरक्षित उतरने की क्षमता से लैस है. 

यह हेलिकॉप्टर दुश्मन की नजरों से बचते हुए उड़ान भर सकता है तथा गहरे अंधेरे में भी अच्छी तरह से काम कर सकता है. यह जहां शक्तिशाली जमीनी हमले कर सकता है, वहीं हवाई युद्ध में भी यह उतना ही सक्षम है. इसीलिए हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) द्वारा निर्मित 15 हेलिकॉप्टरों में से 10 भारतीय वायुसेना के लिए तो पांच सेना के लिए हैं. 

इस हल्के लड़ाकू हेलिकॉप्टर की एक बड़ी विशेषता यह है कि इसका डिजाइन और विकास देश में ही किया गया है और इसमें लगभग 45 प्रतिशत स्वदेशी सामान का इस्तेमाल हुआ है, जिसके आगे चलकर 55 प्रतिशत तक पहुंच जाने की उम्मीद है. दरअसल बदलते वैश्विक परिप्रेक्ष्य में रक्षा क्षेत्र के लिए आयात में कई दिक्कतें नजर आने लगी हैं. 

एक जमाना था जब हम अपनी रक्षा जरूरतों के लिए रूस पर लगभग पूरी तरह से निर्भर थे. रूस ने हमारा साथ भी पूरी तरह से निभाया, लेकिन अब दुनिया अत्याधुनिक हथियारों की दौड़ में इतनी आगे निकल चुकी है कि हम किसी एक देश पर निर्भर नहीं रह सकते. लेकिन रक्षा सामग्रियों के आयात की प्रक्रिया में समय इतना लग जाता है कि अब आयात के भरोसे बैठे रहना खतरे से खाली नहीं है. 

उदाहरण के लिए राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद के लिए चर्चा शुरू होने के बाद से उनके भारतीय वायुसेना में शामिल होने तक करीब बीस साल का समय लग गया था. इसी साल फरवरी में रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता पर आयोजित एक वेबिनार में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा भी था कि हथियार खरीद की प्रक्रिया इतनी लंबी होती है कि हथियारों के आते-आते बहुत ज्यादा समय बीत जाता है और वे पुराने पड़ जाते हैं. 

इसके अलावा विदेशों से आयातित सामानों के बारे में पूरी जानकारी दुश्मन के पास होती है जिससे उसकी काट ढूंढ़ पाना उसके लिए अपेक्षाकृत आसान रहता है. जबकि स्वदेश निर्मित रक्षा सामग्रियों की कई विशेषताओं को दुश्मन से गुप्त रखा जा सकता है और जरूरत पड़ने पर उनका अचानक इस्तेमाल कर उसे चौंकाया जा सकता है. 

आयातित रक्षा सामग्रियों के साथ एक और बड़ी दिक्कत यह है कि अगर उसके उत्पादक देश के साथ हमारे राजनीतिक संबंध बिगड़े तो वह संबंधित सामग्री के कल-पुर्जों का निर्यात रोकने की धमकी भी दे सकता है. इसलिए रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता ही सर्वश्रेष्ठ विकल्प है और संतोष की बात है कि हमारा देश इस दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है.

टॅग्स :नरेंद्र मोदीराफेल फाइटर जेटरूस
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