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Blog: उन बुझती आंखों को बस उस एक चेहरे की तलाश थी

By ऐश्वर्य अवस्थी | Updated: February 21, 2018 14:08 IST

मेरे बच्चे तुझे...और क्या चाहिए, बूढ़े माँ बाप ने तुझको अपनी जवानी दी है ! लेकिन आज का दौर कुछ और ही कह रहा है।

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मेरे बच्चे तुझे...और क्या चाहिए, बूढ़े माँ बाप ने तुझको अपनी जवानी दी है ! लेकिन आज का दौर कुछ और ही कह रहा है। आज के व्यस्त जीवन में हम जिस कद्र खुद को ढाल रहे हैं उससे तो बस यही लग रहा है कि हम इस दौड़ में कुछ अपनों को पीछे छोड़ रहे हैं। ना जाने किस की होड़ है ना जाने किसके लिए उन रिश्तों को छोड़ा जा रहा है जो हमें जीना सिखाते हैं। मैं इस उधेड़बुन में पिछले 4 दिन से हूं। मेरे साथ हाल ही में एक जैसी घटना हुई तो मैं बड़ा असमंजस में हूं क्यों उन रिश्तों को तब छोड़ा जाता है जब सबसे ज्यादा उनकी जरूरत होती है।

हाल ही में वैशाली मैट्रो पर खड़ी अपनी स्कूटी जो कि पार्किंग में थी, लेने के लिए जब गई तो एक जगह भीड़ सी देखी। मैं नजरअंदाज करके आग बढ़ी ही थी कि अचानक अवाज सुनाई दी 'लगता है कोई जानबूझ के छोड़ गया'। फिर क्या था अंदर का पत्रकार  जागा और मैं भी पलट के उस भीड़ का हिस्सा बनने पहुंच गई। वहां जाकर जो देखा वो शायद मैं कभी नहीं भूल सकती हूं। एक 82 साल के बुजुर्ग को देखा जिसकी आंखों में एक अजीब का सन्नाटा था, वे आंखे ना जाने किस चेहरे की तलाश कर रही थीं। 

उनको देखकर मेरे अंदर ना जाने एक दम से क्या हुआ पास जाकर मैंने भी वही किया जो सब कर रहे थे, उस बुजुर्ग से पूछा आपका नाम क्या, यहां कैसे आए और एक साथ ना जाने कितने सवाल मैंने उनके ऊपर उड़ेल दिए। पर वो तो अभी ऐसे  देख रहे थे हमें मानें किसी अंजानी दुनिया में वो आ गए हों। मैं उस वक्त खुद को बड़ा हारा हुआ सा महसूस कर रही थी क्योंकि मैं उनकी कोई मदद नहीं कर पा रही थी। 15, 20 मिनट तक बहुत कोशिश करने के बाद भी जब वो कुछ ना बता पाए तो किसी के सूचित करने पर पुलिस ने जाकर उनसे पूछताछ जारी कर दी। 

पर अचानक से मुझे किसी की याद आई और एक एनजीओ को फोन कर दिया जो बुजुर्गों की देखभाल करते हैं। काफी मसक्त के बात उस बुजुर्ग को एनजीओ को सौंप दिया गया। लेकिन दूसरे दिन जब फोन आया एनजीओ से तो पता लगा कि वो बुजुर्ग छत्तीसगढ़ का आदिवासी था और उसका बेटा उसे इलाज करना के लिए दिल्ली लाया था। वह मैट्रो पर उनको यह कह कर छोड़ गया था कि वह उनके लिए पानी लेने जा रहा और उसकेबाद वह वापस ही नहीं आया।  अब मेरे अंदर बस ये सवाल है कि क्या वो बेटा एक पिता को छोड़कर खुश रह लेगा, दिल कर रहा है कि मैं उस बेटे को ढूंढूं और उससे पूछूं क्या बस यही होता है एक बेटे का फर्ज एक अंजान शहर में पिता को अंजानों के बीच छोड़ देना।

क्या कहता है सर्वे

"मेंटेनेंस एंड वेलफेयर ऑफ पेरेंट्स एंड सीनियर सिटीजन्स एक्ट-2007" 6 दिसंबर, 2007 को पारित किया गया। माता-पिता और अभिभावकों की देखरेख करने के लिए संतानों को कानूनी रूप से बाध्य करने संबंधी विधेयक के तहत अनिवार्य है कि बच्चे व रिश्तेदार अपने पालकों, बुजुर्ग रिश्तेदारों की देखभाल अच्छी तरह करें। इस विधेयक के जरिए बुजुर्गो को कानून की लाठी दी है। वहीं, सर्वे में ये ही कहा गया था कि 75 फीसदी लड़कियां हर हालत में अपने मां बाप को अपने पास रखना पसंद करती हैं।

मुझे इस वक्त बस यही लग रहा है कि देश में ऐसा कोई कानून बनें कि अगर कोई बच्चा अपने मां-बाप को इस तरह से घर से निकालता है तो उसे कड़ी सजा मिले। ना जानें क्यों उस दिन जब मैं घर गई और अपनी मां को देखा तो बस गले लगा लिया। शायद वो बेटा भी कभी दिल से पिता को गले लगाता तो ऐसा नहीं कर पाता।

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