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ब्लॉगः शिक्षा में औपनिवेशिक मानसिकता से उबरने की चुनौती

By गिरीश्वर मिश्र | Updated: November 28, 2022 15:09 IST

इतिहास गवाह है कि औपनिवेशक दौर में पश्चिम से लिए गए विचार, विधियां और विमर्श अकेले विकल्प की तरह दुनिया के अनेक देशों में पहुंचे और हावी होते गए। ऐसा करने का प्रयोजन 'अन्य' के ऊपर आधिपत्य था।

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भारत में ज्ञान और शिक्षा की परंपरा की जड़ें न केवल गहरी और अत्यंत प्राचीन हैं बल्कि यहां विद्या को अर्जित करना एक पवित्र और मुक्तिदायी कार्य माना गया है। इसके विपरीत पश्चिम में ज्ञान का रिश्ता अधिकार और नियंत्रण के उपकरण विकसित करना माना जाता रहा है ताकि दूसरों पर वर्चस्व और एकाधिकार स्थापित किया जा सके। उसी रास्ते पर चलते हुए पश्चिमी दुनिया में मूल्य-निरपेक्ष विज्ञान के क्षेत्र का अकूत विस्तार होता गया और उसके परिणाम सबके सामने हैं। ऐतिहासिक परिवर्तनों के बीच विज्ञान की यह परंपरा यूरोप और अमेरिका से चल कर दुनिया के अन्य क्षेत्रों में फैली। 

इतिहास गवाह है कि औपनिवेशक दौर में पश्चिम से लिए गए विचार, विधियां और विमर्श अकेले विकल्प की तरह दुनिया के अनेक देशों में पहुंचे और हावी होते गए। ऐसा करने का प्रयोजन 'अन्य' के ऊपर आधिपत्य था। इस प्रक्रिया में अंतर्निहित एक साम्राज्यवादी ढांचे के जोर से अध्ययन और अनुसंधान की एक पराई ज्ञान और पंथ आदि की परंपराएं थोपी जाती रहीं। यूरो-अमेरिकी मूल की शाखा या कलम के रूप में रोपे जाने का परिणाम यह हुआ कि उपनिवेशों में उन देशों की स्थानीय या देशज ज्ञान परंपराएं अपदस्थ कर दी गईं। बाद में स्वतंत्रता मिलने के बाद कदाचित जरूरी आत्मविश्वास के अभाव और इस भ्रम के बीच कि वे औपनिवेशिक परंपराएं ही एकमात्र सत्य हैं स्थानीय परम्पराएं निर्जीव सी ही बनी रहीं। दूसरी ओर पराई ज्ञान-प्रणाली में अनुकरण की प्रवृत्ति और परनिर्भरता एक अनिवार्य बाध्यता बनी रही क्योंकि पश्चिम ही प्रामाणिक बना रहा, यहां तक कि देशज ज्ञान का संदर्भ भी वही बन गया। 

भारत का शिक्षा-तंत्र, उसकी प्रक्रियाएं और उपलब्धियां प्रमाण हैं कि इस विशाल देश में स्वायत्त और अपनी संस्कृति व पारिस्थितिकी के अनुकूल शिक्षा की ज़रूरत की पहचान करने में हम विफल रहे और शिक्षा में जरूरी गुणात्मक वृद्धि नहीं हो सकी। शैक्षिक सामर्थ्य का भारतीय स्वप्न जिसे कभी महात्मा गांधी, गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर, पंडित मदन मोहन मालवीय और डाक्टर जाकिर हुसैन जैसे लोगों ने देखा था, अप्रासंगिक बन बीच में ही छूट गया।

गौरतलब है कि दुनिया में जहां-जहां पर उपनिवेश के प्रति आलोचक-बुद्धि और चेतना जगी है वहां के सोच-विचार में उसके परिणाम दिख रहे हैं। उसके फलस्वरूप वहां अपनी संस्कृति के प्रति संवेदना बढ़ी है और औपनिवेशिकता से मुक्ति की इच्छा वाली शैक्षिक व्यवस्था और अनुसंधान की संभावना बनी है। वहां स्वदेशी या देशज नजरिये से अध्ययन की दिशा में कदम आगे बढ़ रहे हैं। इन सब प्रयासों में आत्मालोचन और विकल्पों की तलाश की छटपटाहट आसानी से देखी जा सकती है।  

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