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अवधेश कुमार का ब्लॉगः भाजपा को आत्मविश्लेषण की जरूरत 

By अवधेश कुमार | Updated: November 15, 2018 17:17 IST

यह सामान्य स्थिति नहीं है कि भाजपा तीन लोकसभा उपचुनावों में से दो खो दे और दो विधानसभा चुनावों में खाता न खोले। जितने अंतर से भाजपा हारी है उसका सामान्य अर्थ यही है कि कांग्रेस और जद-से गठबंधन की अभी प्रदेश में तूती बोल रही है।

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कर्नाटक उपचुनाव परिणामों के बाद भाजपा की प्रतिक्रि या है कि इन परिणामों को 2019 में होने वाले आम चुनाव से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। इसके पहले उत्तर प्रदेश के तीन लोकसभा उपचुनाव परिणामों पर उसका यही बयान था और उससे भी पहले राजस्थान के दो लोकसभा उपचुनाव परिणामों पर भी। भाजपा की जगह कोई भी दल केंद्र की बागडोर संभाल रहा होता तो उसकी भी ध्वनि यही होती। भारतीय राजनीति में इतना साहस नहीं बचा है कि वह सच को उसी रूप में अभिव्यक्त कर सके भले ही उसके अनुकूल हो या प्रतिकूल।

इसे संसदीय लोकतंत्न की विडंबना कहनी चाहिए कि चुनाव में मात खाने पर केंद्रित राजनीति के कारण पार्टियां हर स्तर पर केवल सच को ही ढंकने की पाखंडी भूमिका में रहती हैं। मुख्यधारा की कोई पार्टी इसका अपवाद नहीं है। हमें यह मानने में कोई संकोच नहीं है कि उपचुनाव परिणामों में आगामी मुख्य चुनावों की तस्वीर ढूंढना अव्यावहारिक है। हमने अतीत में भी उप चुनावों तथा मुख्य चुनावों के परिणामों में दो ध्रुवों का अंतर देखा है। लेकिन यह नहीं हो सकता कि उपचुनाव परिणामों के राजनीतिक निहितार्थ हों ही नहीं।

हर चुनाव परिणाम अपने अंदर गहन राजनीतिक निहितार्थ लिए होते हैं। यह संभव है कि उन निहितार्थो को हम जिन रूपों में देख रहे हैं दूसरे उसे अलग रूपों देखें किंतु उनको राजनीतिक रूप से महत्वहीन नहीं माना जा सकता। कहने का तात्पर्य यह कि भाजपा के लिए इनके मायने हैं और उसमें 2019 का आम चुनाव भी निहित है।

यह सामान्य स्थिति नहीं है कि भाजपा तीन लोकसभा उपचुनावों में से दो खो दे और दो विधानसभा चुनावों में खाता न खोले। जितने अंतर से भाजपा हारी है उसका सामान्य अर्थ यही है कि कांग्रेस और जद-से गठबंधन की अभी प्रदेश में तूती बोल रही है। शिमोगा सीट वह किसी तरह बचा सकी। भाजपा केवल हारी नहीं है, उसके वोट भी घटे हैं। भाजपा को गहराई से विश्लेषण करना होगा कि ऐसा क्यों हुआ?

प्रधानमंत्नी नरेंद्र मोदी ने चुनाव प्रचार नहीं किया इसका भी असर हो सकता है, पर यह मानकर यदि वह निश्चिंत रहेगी कि आम चुनाव में मोदी प्रचार करने आएंगे और मतदाताओं का मन बदल जाएगा तो उसे आगे भी झटका लग सकता है।  भाजपा यदि राष्ट्रीय स्तर पर आज परिस्थितियों के अनुरूप अनुकूल भूमिका अपनाती है तो शायद उसके विरु द्ध अन्य कारक कमजोर हो जाएं। 

टॅग्स :भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी)विधानसभा चुनाव
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