सड़क एक, पर तमाशा करने वाले अनेक

By Amitabh Shrivastava | Updated: April 25, 2026 05:38 IST2026-04-25T05:38:15+5:302026-04-25T05:38:15+5:30

सड़क पर नेताओं का आवागमन हो या चुनाव की जीत या फिर कोई आंदोलन, यातायात के बीच ही सब कुछ सम्पन्न होता है.

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Highlightsकोई सबक सिखाने की बात तक करता सुनाई पड़ रहा है.धार्मिक आयोजन हों या फिर सामाजिक जागृति, सभी के लिए सड़कें ही उचित स्थान होती हैं.सीमित मान लिया जाए या फिर इसे अक्सर ऐसी उठती परेशानियों की उपज कहा जाए.

मुंबई के वरली क्षेत्र में भारतीय जनता पार्टी(भाजपा) के महिला आरक्षण को लेकर हुए आंदोलन के दौरान एक महिला का आक्रोश चर्चाओं के केंद्र में है. उसका मंत्री गिरीश महाजन के समक्ष नाराजगी दिखाना सोशल मीडिया पर साहस की नजर से देखा जा रहा है. इस बीच, कोई पुलिस में मामला दर्ज कराने की बात कर रहा है और कोई सबक सिखाने की बात तक करता सुनाई पड़ रहा है.

सवाल यह है कि महिला का गुस्सा केवल घटना मात्र तक सीमित मान लिया जाए या फिर इसे अक्सर ऐसी उठती परेशानियों की उपज कहा जाए. सड़क पर नेताओं का आवागमन हो या चुनाव की जीत या फिर कोई आंदोलन, यातायात के बीच ही सब कुछ सम्पन्न होता है. धार्मिक आयोजन हों या फिर सामाजिक जागृति, सभी के लिए सड़कें ही उचित स्थान होती हैं.

इन गतिविधियों के बीच वाहनों के आवागमन के लिए सुगम जगह तय हो पाना कठिन होता जा रहा है. नियमों में किसी वाहन के सड़क पर आने के लिए पहली शर्त सड़क कर (रोड टैक्स) ही होती है, लेकिन उसे भर कर वाहनधारी सबसे विवश नजर आते हैं. मुंबई में भाजपा के आंदोलन के बीच नाराजगी व्यक्त करने वाली महिला की चिंता यह थी कि वह अपने बच्चे को स्कूल से लेने जा नहीं पा रही थी.

उसके गुस्से पर मंत्री महाजन का कहना है कि महिला के शब्द और व्यवहार ठीक नहीं थे. किंतु जब बात सिर से गुजर जाए तो क्या शालीनता का पाठ पढ़ाया जा सकता है. महाजन इस बात का जवाब नहीं देते हैं कि उस अवसर पर जिन भाजपा कार्यकर्ताओं को सज्जनता से पेश आना चाहिए था, वह वीडियो में पुलिस से कहते नजर आ रहे हैं कि इसे ले जाओ नहीं तो मार खाएगी. दरअसल नेताओं के पास अपने कार्यकर्ताओं के लिए कोई संदेश नहीं है. इस घटना में वे कह ही रहे हैं, किंतु अनेक अवसरों पर हाथ चलाते दिख जाते हैं. इस स्थिति में पुलिस उनका ही साथ देती दिखाई देती है. जिसके चलते उनके हौसले बुलंद रहते हैं.
यदि सड़क पर आंदोलन को लेकर भाजपा के नाम पर हंगामा मचा है, तो अन्य स्थान और दल भी किसी रूप में पीछे नहीं हैं. बस समस्या भीड़ जुटाने की ताकत की है. वरना कांग्रेस, शिवसेना और अन्य राज्यों में आम आदमी पार्टी, अकाली दल, राष्ट्रीय जनता दल, तृणमूल कांग्रेस, द्रमुक, अन्नाद्रमुक के साथ वामपंथी दल सड़कों पर उतरने को अपने आंदोलन की सफलता और तीव्रता की पहचान मानते हैं.

इसके पीछे वे लोकतंत्र में विरोध का अधिकार बताते हैं. मुश्किल यह है कि संवैधानिक अधिकार का प्रयोग कहां किया जा रहा और उसका उद्देश्य क्या है? देश की राजधानी दिल्ली में धरना-प्रदर्शन के लिए कुछ स्थान निर्धारित किए गए हैं. मुंबई में भी कुछ स्थानों पर आंदोलन किए जाते हैं. मगर अधिकतर स्थानों पर सड़कों को ही आंदोलन का मार्ग माना जाता है.

हालांकि सभी गतिविधियों को पुलिस और प्रशासन की अनुमति प्राप्त होती है. जिसे अनेक बार सरकारी दबाव में भी पूरा किया जाता है.राजनीतिक आंदोलनों के अलावा सड़कों पर सांस्कृतिक और सामाजिक आयोजन कम नहीं होते हैं. महापुरुषों की जयंती, सभी धर्मों के उत्सवों पर सड़क पर उत्साह दिखाई देता है. जिसमें कुछ अनुमति के साथ होता है और कुछ अवैध रूप से भी होता है.

मगर व्यापक दृष्टिकोण में पुलिस कोई कार्रवाई नहीं करती है. इस स्थिति में आयोजनों से अलग वाहनधारी परेशानियों का सामना करते हैं. पुलिस अधिक आक्रामक होने की बजाय बीच का रास्ता निकालना बेहतर मानती है, जो बहुत कम अवसरों पर ही सुगम हो पाता है. मगर जन आक्रोश हर तरफ ही नजर आता है.

स्वाभाविक रूप से जिनका सहभाग नहीं होता, उनकी आयोजन के प्रति कोई सहानुभूति नहीं होती है. मगर इसमें सर्वाधिक अपेक्षा प्रशासन से होती है, जो जनजीवन को सामान्य बनाए रखने के लिए न केवल जिम्मेदार, बल्कि जवाबदेह भी होता है. यदि आयोजनों के प्रकार सफलता, नाराजगी, खुशी जैसे कुछ मान लिए जाएं तो क्या उन्हें सार्वजनिक रूप से हंगामे से ही प्रकाश में लाया जा सकता है.

आश्चर्यजनक रूप से सभी आयोजनों में जनप्रतिनिधि बड़ी संख्या में दिखाई देते हैं, जिनसे प्रशासन सहयोग की अपेक्षा रखता है. यदि इनसे थोड़े लोगों को खुशी और ज्यादा लोगों को परेशानी होती है तो उन्हें मानवीय दृष्टि से भी उचित नहीं ठहराया जा सकता है. यदि आयोजन अपरिहार्य हैं तो हर स्थान पर उनके लिए एक स्थान और एक मार्ग निर्धारित कर दिया जाना चाहिए,

जिससे उत्सवी माहौल में भी खलल न पड़े और शहर का जनजीवन भी अस्त-व्यस्त न हो. किंतु इसके लिए नीति-निर्धारण और व्यवस्था को तैयार करना होगा. मुंबई की घटना के बाद कई मिलती-जुलती घटनाएं सामने आई हैं. किंतु अभी तक किसी राजनेता ने पहल करते हुए इस समस्या के निराकरण के लिए आवाज नहीं उठाई है.

क्योंकि वे आयोजन किसी अवसर विशेष पर होते हैं, लेकिन रोजाना के सड़कों पर दौड़ते नेताओं के काफिले अपने आप में एक नियमित समस्या का कारण बन चुके हैं. उनके दिन-रात बजते सायरन, रास्ता खाली कराया जाना जन-जन की परेशानी है. इसलिए यदि सड़क के आयोजनों पर नियंत्रण की बात उठेगी तो नेताओं के वाहन भी गिने जाएंगे.

आवश्यक यही है कि सड़क वाहनों के लिए तैयार की गई है और उसे वाहनधारियों के लिए मुक्त रखना चाहिए, क्योंकि उन्होंने विधिवत उसका कर भी चुकाया है. बाकी आयोजनों और नेताओं की आवाजाही कुछ भावनात्मक और कुछ आक्रामक रुख के साथ न मिटने वाली ‘वीआईपी कल्चर’ गतिविधि है, जिसका हल परेशानी पैदा करने वाले ही दे सकते हैं.  

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