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उद्धव ठाकरे को विधान परिषद का सदस्य निर्वाचित करने में देरी पर भड़के संजय राउत, कहा- राजभवन राजनीतिक साजिश का केंद्र न बने

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: April 20, 2020 06:56 IST

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे राज्य विधानसभा या विधान परिषद में से किसी के भी सदस्य नहीं हैं। संविधान के अनुसार अगर शपथ ग्रहण के छह महीने के अंदर वे विधानसभा या विधानपरिषद में से किसी की सदस्यता ग्रहण नहीं करते हैं तो उन्हें इस्तीफा देना पड़ सकता है।

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ठळक मुद्देकोरोना लॉकडाउन के बीच महाराष्ट्र में सियासत चरम परउद्धव ठाकरे को विधान परिषद का सदस्य निर्वाचित करने में राज्यपाल की तरफ से मंजूरी में हो रही देरी पर भड़की शिवसेना

मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को विधान परिषद का सदस्य निर्वाचित करने में राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी की तरफ से मंजूरी मिलने में हो रही देरी पर रविवार को शिवसेना का गुस्सा फूट पड़ा और पार्टी सांसद संजय राउत ने परोक्ष रूप से पूर्व भाजपा नेता पर निशाना साधा.

राज्यपाल कोटे से ठाकरे को विधान परिषद में नामित किए जाने के लिए राज्य मंत्रिमंडल द्वारा हाल में की गई सिफारिश पर विधिक राय मांगने वाले राज्यपाल कोश्यारी का नाम लिए बगैर ही राउत ने इस बात का कोई संशय नहीं छोड़ा कि उनके निशाने पर कौन है.राउत ने ट्वीट किया, 'राज भवन, राज्यपाल का आवास राजनीतिक साजिश का केंद्र नहीं बनना चाहिए. याद रखिए, इतिहास उन लोगों को नहीं छोड़ता जो असंवैधानिक व्यवहार करते हैं.'

28 मई तक लेनी होगी सदस्यता: उद्धव ठाकरे राज्य विधानसभा या विधान परिषद में से किसी के भी सदस्य नहीं हैं,संविधान के मुताबिक किसी मुख्यमंत्री या मंत्री को शपथ लेने के छह महीने के अंदर विधानसभा या विधानपरिषद में से किसी की सदस्यता ग्रहण करनी होती है, ऐसा नहीं होने पर उसे इस्तीफा देना पड़ता है. ठाकरे ने 28 नवंबर 2019 को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी और उनके छह महीने 28 मई 2020 को पूरे हो रहे हैं.

राज्य के उप-मुख्यमंत्री अजीत पवार ने हाल ही में कैबिनेट की एक बैठक में ठाकरे का नाम राज्यपाल द्वारा विधान परिषद के लिए नामित किए जाने वाले सदस्य के तौर पर सुझाया था.राज्य सरकार ने इससे पहले भी फरवरी माह मेें दो सदस्यों को नामित करने के लिए प्रस्ताव भेजा था. उस पर भी अब तक राज्यपाल ने निर्णय नहीं किया है. यदि उन्होंने ठाकरे के लिए भेजा गया प्रस्ताव स्वीकृत नहीं किया तो मुख्यमंत्री को इस्तीफा देना पड़ सकता है. इसके चलते राज्य में संवैधानिक संकट पैदा हो सकता है.

रामलाल का मामला याद दिलाया: शिवसेना सांसद राउत ने तंज कसते हुए कहा कि पता नहीं क्यों, इस समय रामलाल जैसे निर्लज्ज राज्यपाल की अचानक याद आ रही है. समझने वालों को इशारा काफी है. इस तरह से उन्होने अपने अन्य ट्वीट में आंध्र प्रदेश के राज्यपाल रहे राम लाल को 'बेशर्म' के तौर पर संदर्भित किया.आंध्र प्रदेश में 15 अगस्त 1983 से 29 अगस्त 1984 तक राज्यपाल रहे राम लाल उस वक्त विवादों में घिर गए थे जब उन्होंने अमेरिका में ऑपरेशन कराने गए मुख्यमंत्री एन टी रामाराव की जगह राज्य के वित्त मंत्री एन भास्कर राव को राज्य का मुख्यमंत्री नियुक्त कर दिया था. जबकि भास्कर राव के पास 20 प्रतिशत विधायकों से ज्यादा का समर्थन नहीं था.

एनटीआर एक हफ्ते बाद विदेश से लौटे और राम लाल के खिलाफ व्यापक अभियान शुरू किया. एक महीने बाद तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने राम लाल को राज्यपाल के पद से बर्खास्त कर दिया और इसके तीन दिन बाद एनटीआर दोबारा राज्य के मुख्यमंत्री बने थे. भाजपा नेता ने भी दी नसीहत इस बीच, भाजपा के पूर्व राज्यसभा सांसद संजय काकड़े ने भी कहा है कि राज्यपाल को कटुता या बदले की भावना न रखते हुए ठाकरे को विधानपरिषद का सदस्य बनाने संबंधी प्रस्ताव स्वीकार कर लेना चाहिए. उन्होंने अपने दल के नेताओं को भी नसीहत दी. उन्होंने कहा कि देवेंद्र फडणवीस और भाजपा प्रदेशाध्यक्ष चंद्रकांत पाटिल को खुद होकर राज्यपाल के पास जाना चाहिए और ठाकरे के लिए स्वीकृति मांगनी चाहिए.

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