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बिहार में अमित शाह का दौरा भाजपा की धर्म आधारित राजनीति महागठबंधन पर पड़ सकती है भारी

By एस पी सिन्हा | Updated: September 23, 2022 18:15 IST

जानकारों का मानना है कि महागठबंधन की जातीय राजनीति पर भाजपा की धर्म पर आधारित राजनीति भारी पड़ सकती है। धार्मिक ध्रुवीकरण के जरिए भाजपा महागठबंधन की जातीय राजनीति को जबाब देने की अपने मकसद में कामयाब हो सकती है।

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ठळक मुद्देजानकारों की मानें तो अल्पसंख्यक वोट अलग-अलग पार्टियों में बंट जाएगीजबकि हिन्दू वोट भारतीय जनता पार्टी को एकमुश्त मिल सकता हैयहां अल्पसंख्यकों की आबादी 2011 की जनगणना के मुताबिक 16 फीसदी है

पटना: केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के दो दिवसीय बिहार दौरे पर सियासत गर्मा गई है। अमित शाह के दौरे से एक ओर जहां भाजपा चुनावी समीकरण को मजबूत करने के प्रयास में जुट गई है तो दूसरी ओर महागठबंधन दलों में बेचैनी देखी जा रही है। जानकारों का मानना है कि महागठबंधन की जातीय राजनीति पर भाजपा की धर्म पर आधारित राजनीति भारी पड़ सकती है। धार्मिक ध्रुवीकरण के जरिए भाजपा महागठबंधन की जातीय राजनीति को जबाब देने की अपने मकसद में कामयाब हो सकती है।

जानकारों की मानें तो अल्पसंख्यक वोट अलग-अलग पार्टियों में बंट जाएगी और हिन्दू वोट उन्हें एकमुश्त मिल सकता है। सीमांचल राज्य का एक ऐसा इलाका है, जहां राज्य की सबसे ज्यादा अल्पसंख्यक आबादी निवास करती है। राज्य भर में अल्पसंख्यकों की आबादी 2011 की जनगणना के मुताबिक 16 फीसदी है। 

सीमांचल के 4 लोकसभा क्षेत्रों में 30 से लेकर 70 प्रतिशत आबादी इसी समुदाय की है। सबसे ज्यादा लगभग 70 फीसदी अल्पसंख्यक मतदाता केवल एक लोकसभा क्षेत्र किशनगंज में है। वहीं दूसरे स्थान पर कटिहार है, जहां अल्पसंख्यक मतदाताओं की संख्या 40 फीसदी है। इसके अलावा अररिया में 35 फीसदी, पूर्णिया में 33 फीसदी है। 

बांग्लादेश और नेपाल की सीमा से सटे बिहार के सीमांचल में लोकसभा की चार सीटें हैं। किशनगंज, कटिहार, अररिया और पूर्णिया। इनमें अभी सिर्फ एक सीट अररिया पर भाजपा का कब्जा है। जबकि तीन सीटें महागठबंधन के पास है।

वहीं, विधानसभा की बात करें तो एआईएमआईएम पिछले विधानसभा चुनाव में 20 सीटों पर चुनाव लड़ी थी। इसमें 14 अकेले सीमांचल के थे। इनमें से 5 सीटों पर जीत दर्ज करने में कामयाबी मिली थी। हालांकि उनके 4 विधायक बाद में राजद में शामिल हो गए थे। 

ऐसे में यह स्पष्ट है कि सीमांचल में ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम ने अपनी जमीन तैयार कर ली है और इसका परिणाम भी उसे मिलने लगा है। ऐसे में भाजपा की यही रणनीति है कि यहां के हिंदू मतदाताओं को अपने पाले में लाने का प्रयास किया जाये। 

वहीं, अमित शाह रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठ के खिलाफ लगातार मुखर रहे हैं। वे स्पष्ट कर चुके हैं कि किसी भी सूरत में रोहिंग्या को देश में बसने नहीं देंगे। भाजपा लगातार कहते रही है कि बिहार का सीमांचल ही इलाका है, जहां इनकी आबादी सबसे अधिक है। ऐसे में भाजपा अब अपनी सधी चाल चलते हुए आगे की रणनीति पर काम करने लगी है। 

भाजपा के राष्ट्रीय स्तर के नेता वहां सीधा संवाद करेंगे। इसके बाद प्रदेश के बड़े नेता और सांसद प्रवास करेंगे। इसके बाद जिले व प्रखंड स्तर के कार्यकर्ताओं को बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं को लोगों को अपने पक्ष में काम करने की जिम्मेदारी दी जा रही है।

टॅग्स :अमित शाहBJPमहागठबंधनबिहार
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